पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/१९१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


जैसे कोई ला अध्यापक के सामने बेन खाने को खड़ा होता है। इसने मुझे क्या दण्ड देने का विचार किया है ? कहाँ मेरो मुश्क तो न कस शवेगा, या कान पकहकर उठा-बैठो तो न करावेगा। देवताओं से सहायता मिलने की कोई आशा तो न थी, पर अदृश्य का आवाहन करने के अतिरिक्त और उपाय हो क्या था। मुझे सिपाहियों के हार्थों में छोड़कर साहब दफ्तर में गये और वहाँ से मोहर छापने की श्याही और ब्रश लिये हुए निक। अब मेरो आँखों से अश्रुपात होने लगा। यह घोर अपमान और थोड़ो-सो शराब के लिए ! वह भो दुगने दाम देने पर। साहब ब्रश से मेरे मुँह में काळिमा मौत रहे थे, वह लालिमा, जिसे धोने के लिए सेरों सावुन की जरूरत थी, और ले भोगो विल्लो को भाति खड़ा था। उन दोनों यमदूतों को सासुमा पर दया न आती थो, दोनों हिदोस्तानी थे, पर उन्हीं के हाथों मेरी यह दुर्दशा हो रही थी। इस देश को स्वराज्य मिल चुका ! साहब कालिख पोतते और हंसते जाते थे। यहां तक कि आँखों के सिवा तिल. भर भी जगह न घदी ! थोड़ी-सौ शराब के लिए भादमी से जनमानुष बनाया जा रहा था। दिल में सोच रहा था, यहाँ से जाते हो जाते बचा पर मानहानि की नालिश कर दूंगा, या किसी बदमाश से बाह गा, इजलास हो पर पचा को जुतौ से खबर ले । सुन्ने मनमानुष बना हर साहब ने मेरे हाथ छुड़वा दिये और तालो बञाता हुआ मेरे पीछे दौड़ा । नौ पजे का समय था। फर्मवारी, मुवक्किल, चपरासी सभी आ गये थे। सैकड़ों आदमी जमा थे, मुझे न जाने क्या शामत सूझो कि वहां से भागा । यह उन प्रहसन का सबसे करुणाजनक दृश्य था। आगे-आगे मैं दौड़ा जाता था, पोछे-पीछे साहन, और अन्य सैकड़ों आदमो तालियां बजाते 'लेना लेना, जाने न पावे' का गुल मचाते दौड़े आते थे, मानों किसी बदर को भगा रहे हों। • लगभग एक मील तक यह दौड़ रहो । वह तो कहो, मैं कसरतो आदमी हूँ, बच. कह निकल आया, नहीं मेरो न जाने और क्या दुर्गति होती। शायद मुझे गधे पर मिठाकर घुमाना चाहते थे। जब सप पीछे रह गये, तो मैं एक नाले के किनारे बेदम होकर बैठ रहा । अब मुझे सूझो कि यहाँ कोई आया तो पत्थरों से मारे बिना न छोडूं गा, चाहे उलटो पड़े या सोधी । किन्तु मैंने नाले में मुँह धोने की चेष्टा नहीं की। जानता था, पानी से यह कालिमा न छूटेगो । यही सोचता रहा कि इस अंगरेज पर कैसे अभियोग चलाऊँ ? यह तो छिपाना ही पड़ेगा कि मैंने इसके खानसामा से चोरो .