पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२२१

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) अयार प्रेम से दोनों बिह्वल हो रहे थे। रत्ना गुणों पर मोहित थी, आचार्य उसके मोह के वशीभूत थे। अगर रत्ना उनके रास्ते में न आती तो कदाचित वह उससे परि- चित भी न होते । किन्तु प्रेम के फैले हुए वाहों का आकर्षण किस पर न होगा। ऐसा हृदय पहा है, जिसे प्रेम जोत न सके ? थाचार्य महाशय बड़े दुहिधे में पड़े हुए थे। उनका दिल कहता था, जिस क्षण रत्ना से मेरो असलियत खुल जायगी, उसी क्षण वह मुझसे सदैव के लिए मुंह फेर -लेगो। वह जितनी ही उदार हो, जाति के बन्धन को कितना ही कष्टमय समझतो हो, किन्तु उस घृणा से मुक्त नहीं हो सकती जो स्वभावतः मेरे प्रति उत्पन्न होगो। मगर इस बात को जानते हुए भी उनकी हिम्मत न पड़ती थी कि अपना वास्तविक स्वरूप खोलकर दिखा दें। आह ! यदि घृणा हो तक होतो तो कोई बात न थी, मगर उसे दुख होगा, पीड़ा होगी, उसका हृदय विकीर्ण हो जायगा, उस दशा में न माने बैठे। उसे इस अज्ञात दशा में रखे हुए प्रणय पाश को दृढ़ करना उन्हें परले ठिरे को नोचता प्रतीत होती थी। यह काट है, दगा है, धूर्तता है जो, प्रेमावरण में सर्वथा निषिद्ध है। इस सङ्कट में पड़े हुए वह कुछ निश्चय न कर सकते थे कि क्या करना चाहिए। उधर रायसाहब की आमदोरफ्त दिनोंदिन बढ़ती जाती थी। उनके मले को बात एक-एक शप से झलकतो थो। रत्ना का आना-जाना बन्द होता जाता था, जो उनके आशय को और भी प्रकट कर था। इस प्रकार तीन-चार महीने व्यतीत हो गये । आचार्य महाशय सोचते यह वही रायसाहव हैं, जिन्होंने केवल रत्ना को चारपाई पर प्ररा देर लेट रहने के लिए मुझे मारकर घर से निकाल दिया था। जम उन्हें मालूम होगा कि मैं वही अनाथ, अछुत, आश्रयहीन बालक हूँ तो उन्हें कितनी आत्मवेदना, कितनी अपमान-पोड़ा, कितनो लज्जा, कितनी दुराशा, कितना पश्चात्ताप होगा। एक दिन रायसाहब ने कहा-विवाह की तिथि निश्चित कर लेनी चाहिए। इस - लग्न में मैं इस ऋण से उऋण हो जाना चाहता हूँ। आचार्य महाशय ने बात का मतलब सममकर भी प्रश्न किया-कैसी तीथि ? रायसाहस -- यही रत्ना के विवाह को। मैं कुन्डलो का तो कायल नहीं, पर विवाह तो शुभ मुहूर्त में हो होगा।