पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२८

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नरक माग सुशोला गभीर भाव से बोली- नहीं बहन, मरूँगी नहीं, उनकी याद मुझे सदैव प्रफुल्लित करती रहेगी, चाहे उन्हे परदेश में परसों लग जायें। मैं यही प्रेम चाहती हूँ, इसी चोट के लिए मेरा मन तड़पता रहता है, मैं भी ऐसी ही स्मृति चाहती हूँ जिससे दिल के तार सदैव बजते रहें, जिसका नशा नित्य छाया रहे। ( . रात रोते-रोते हिचकियां बंध गई। न-जाने क्यों दिल भर-भर आता था। अपना जीवन सामने एक बीहड़ मैदान की भांति फैला हुआ मालूम होता था, जहाँ बगूलों के सिवा हरियाली का नाम नहीं । घर फाड़े खाता था, चित्त ऐसा चचल हो रहा था कि कहीं उफ जाऊँ । आजकल भक्ति के प्रन्यों की ओर ताबने का जो नहीं चाहता, कहीं सैर करने जाने की भी इच्छा नहीं होती, क्या चाहती हूँ, यह मैं स्वयं नहीं जानती। लेकिन मैं जो नहीं जानतो वह मेरा एक-एक रोम जानता है, अपनी भावनाओं की सजीव मूर्ति हूँ, मेरा एक-एक अग मेरी आन्तरिक वेदना का आर्तनाद हो रहा है। मेरे चित्त की चञ्चलता उस भन्तिम दशा को पहुंच गई है, जब मनुष्य को निन्दा की न लज्जा रहती है और न भय । जिन लोभी, स्वार्थी माता-पिता ने मुझे कुएँ में ढकेला, जिस पाषाण-हृदय प्राणी ने मेरी मांग में सेंदुर डालने का स्वांग किया, उनके प्रति मेरे मन में बार-बार दुष्कामनाएँ उठती हैं, मैं उन्हें लज्जित करना चाहती हूँ। मैं अपने मुँह में कालिख लगाकर उनके मुख में कालिख लगाना चाहती हूँ। मैं अपने प्राण देकर उन्हें प्राण-दण्ड दिलाना चाहती हूँ। मेरा नारीत्व लुप्त हो गया है, मेरे हृदय में प्रचण्ड ज्वाला उठी हुई है। घर के सारे आदमी सो रहे थे। मैं चुपके से नीचे उतरी, द्वार खोला और घर से निकलो ; जैसे कोई प्राणी गमी से व्याकुल होकर घर से निकले और किसी खुली हुई जगह को और दौड़े। उस मकान में मेरा दम घुट रहा था। सड़क पर सन्नाटा था, दुकाने बन्द हो चुकी थीं। सहसा एक बुढ़िया आती हुई दिखाई दी। मैं हरी कि कहीं चुडैल न हो। बुढ़िया ने मेरे समीप आकर मुझे सिए से पाँव तक देखा, और बोली-किसको राह देख रही हो ! मैंने चिढ़कर कहा-मौत को ?