पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२८५

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२८४ मानसरावर 1 , जरा अपनी कुप्पी मुझे दे। देखू तो वहाँ क्या रेंग रहा है। मुझे भय होता है कि साप न हो। खोचेवाले ने कुप्पी उतारकर दे दो। पण्डितजी उसे लेकर इधर-उधर जमीन पर "कुछ खोजने लगे। इतने में कुप्पो उनके हाथ से छूटकर गिर पड़ी, और बुम गई । सारा तेल बह गया। पण्डितजी ने उसमें एक ठोकर और कगाई कि बचा-खुचा तेल भी कह जाय। खल्चेवाला- (कुप्पो को हिलाकर )-महाराज, इसमें तो जरा भो तेल नहीं बचा । अब तक चार पैसे का सौदा बेवता, आपने यह खटराग बढ़ा दिया। मोटेराम-भैया, हाथ हो तो है, छूट गिरो, तो भा क्या हाथ काट डालू। यह लो पैसे, जाकर कहीं से तेल भरा लो। खाँचेवाला-(पैसे लेकर ) तो अब तेल भरवाकर मैं यहाँ थोड़े हो आऊँगा। मोटेराम-खोचा रखे जाओ, लपककर थोक्ष तेल ले लो ; नहीं मुझे कोई सांप काट लेगा तो तुम्हों पर हत्या पड़ेगी। कोई जानवर है जरूर । देखो, वह रेंगता है। कायम हो गया। दौड़ जामो पट्टे, वेल लेते आमो, मैं तुम्हारा खोचा देखता रहूंगा। डरते हो तो, अपने रुपये-पैसे लेते जाओ। खोंचेवाला बड़े धर्म-संकट में पड़ा। खोचे से पैसे निकालता है, तो भय है 'कि पण्डितजी अपने दिल में बुरा न माने । सोचें, मुझे बेईमान समझ रहा है। छोड़- कर जाता हूँ तो कौन जाने, इनकी नीयत क्या हो । किसी को नीयत सदा ठीक नहीं रहती। अन्त को उसने यहो निश्चय किया कि खोंचा यहों छोड़ दं, जो कुछ तक्रदोर में होगा, वह होगा। वह उधर बाजार की तरफ चला, इधर पण्डितजी ने खोंचे पर 'निगाह दौड़ाई, तो बहुत हताश हुए। मिठाई बहुत कम अव रही थी। पांच-छः चोर्जे यो, मगर किसी में दो अझ्द से ज्यादा निकालने की गुजाइश न थी। भडा फूट पाने का खटका था । पण्डितजओ ने सोचा-इतने से क्या होगा! केवल क्षुधा और प्रपळ हो जायगी, शेर के मुंह में खून लग जायगा 1 गुनाह बेज्जत है। अपनी जगह पर आ बैठे। लेकिन दम-भर के बाद प्यास ने फिर जोर किया। सोचे--कुछ तो ढारस हो ही जायगा। आहार जितना हो सूक्ष्म हो, फिर भी माहार हो है। उठे, मिठाई 'निकाली 5 पर पहला हो लड्डू मुंह में रखा,था कि देखा, सोचेवाला तेल को कुप्पी जलाये कदम बढ़ता चला आ रहा है। उसके पहुंचने के पहले मिठाई का समाप्त हो ।