पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२८८

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सत्याग्रह २८७ . मन्त्रीजी पुलीस-विभाग में बहुत दिनों तक रह चुके थे, मानव चरित्र को कम- जोरियों को जानते थे। वह सीधे बाजार गये, ओर ५) को मिठाई लो। उसमें मात्रा से अधिक सुगंध ढालने का प्रयत्न घिया, चांदी के वरक लगवाये, और एक दोने में लिये रूठे हुए ब्रह्मदेव की पूजा करने चले। एक झन्झर में ठंढा पानो लिया, और उसमें केवड़े का जल मिलाया । दोनेा ही चोलो से खुशबू की लपटें उड़ रही थीं। सुगन्ध में कितनी उत्तेजक शक्ति है, कौन नहीं जानता। इससे बिना भूख को भूख लग आती है, भूखे आदमो की तो बात हो क्या ? पण्डितजी इस समय अचेत भूमि पर पड़े हुए थे। रात को कुछ नहीं मिला। दस पांच छोटी-छोटी मिठाइयों का क्या जिक्र । दोपहर को कुछ नहीं मिला, और इस वक्त भी भोजन की वेला टल गई थी । भूख में अव आशा की व्याकुलता नहीं, निराशा की शिथिलता थी। सारे अग ढीले पड़ गये थे। यहां तक कि आंखें भी न खुलती यो। उन्हें खोलने को बार-बार चेष्टा करते ; पर वे आप-हो-आप बन्द हो जाती। भोठ सूख गये थे। जिदगो का कोई चिह्न था, तो बस, उनका धीरे-धीरे कराइना । ऐसा घोर सकट उनके ऊपर कभी न पड़ा था। अजओर्ण की शिकायत तो उन्हें -महोने में दो-चार वार हो जाती थी, जिसे वह हड़ आदि की फकियों से शान्त कर लिया करते थे ; पर अजीर्णावस्था में ऐसा कभ न हुआ था कि उन्होंने भोजन छोड़ दिया हो। नगर निवासियों को, अमन सभा को, सरकार को ईश्वर को, कांग्रेस को और धर्म पत्नी को जो-भरकर कोस चुके थे। डिसो से कोई आशा न थी। अब इतनी शक्ति भी न रही थी कि स्वय खड़े होकर बाजार जा सके। निश्चय हो गया था कि आज रात को अवश्य प्राण-पखेरू उड़ जायगे। जोवन-सूत्र कोई रस्सी तो है ही नहीं कि चाहे जितने झटके दो, टूटने का नाम न ले। मन्त्रीजी ने पुकारा- शास्त्रोजी ! मोटेराम ने पड़े-पड़े भाखें खोल दी। उनमें ऐसी करुणवेदना भरी हुई थो, जैसे किसी बालक के हाथ से कौआ मिठाई छोन है गया हो। मन्त्रीजी ने दोने को मिठाई सामने रख दो, और मझर पर कुल्हड़ भौंधा दिया । इस छाम से सुचित्त होकर बोले-यहाँ कब तक पढ़े रहिएगा? सुगन्ध ने पण्डितजी को इन्द्रियों पर सजोवनो का काम किया। पण्डितजो उठ मैठे, और बोले- देखो, ऋष तक निश्चय होता है.।