पृष्ठ:मानसरोवर भाग 3.djvu/२९६

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भादे का टट्टू २९५ रमेश -- हानि-लाभ देखना मेरा काम नहीं । मेरा काम तो अपने कर्तव्य का पालन करना यशक्त-हठी तो तुम सदा के हो, मगर मोका नाजुक है, संभले रहना हो मच्छा है। अगर मैं देखता कि जनता में वास्तविक जागृति है, तो तुमसे पहले मैदान में आता । पर जब देखता हूँ कि अपने ही मरे स्वर्ग देखना है, तो आगे कदम रखने की हिम्मत नहीं पड़ती दोनों दोस्तों में देर तक बातें हुआ को। कालेज के दिन याद आये । सहपाठियों के लिए कालेज को पुरानो स्मृतियों मनोरंजन और हास्य का अविरल स्रोत हुआ करतो हैं। अध्यापकों पर मालोचनाएँ हुई ; कौन-कौन साथी क्या कर रहा है, इसको चरचा हुई। बिलकुल यहो मालूम होता था कि दोनों भा भो कालेज के छात्र हैं । गभीरता नाम को भो न थी। रात ज्यादा हो गई। भोजन करते-करते एक बन गया। यशवत ने कहा- कहाँ जाओगे, यहीं सो रहो, और बाते हो। तुम तो कभी आते भी नहीं ? रमेश तो रमते जोगी थे ही खाना खाकर बातें करते-करते सो गये। नींद खुली, तो ९ बज गये थे। यशवत सामने खड़े मुसकिरा रहे थे। इसो रात को आगरे में भयकर ढाका पड़ गया। रमेश दस पजे घर पहुंचे, तो देखा, पुलीस ने उनका, मकान घेर रखा है। इन्हें देखते ही एक अफसर ने वारट दिखाया। तुरन्त घर को तलाशी होने लगी। मालूम नहीं, क्यो हर रमेश के मेज़ की दरात में एक पिस्तौल निकल आया। फिर क्या था, हार्थों में हथकसी पड़ गई । अब किसे उनके डाके में शरीक होने से इनकार हो सकता था ? और भो कितने ही आदमियों पर आमत आई। सभी प्रमुख नेता चुन लिये गये । मुकदमा चलने लगा। औरों की बात तो ईश्वर जाने, पर रमेश निरपराध था। इसका उसके पास ऐसा प्रबल प्रमाण था, जिसकी सत्यता से किसी को इनकार न हो सकता था। पर क्या वह इस प्रमाण का उपयोग कर सकता था ? रमेश ने सोचा, यशपत स्वय मेरे वकील द्वारा सफाई के गवाहों में अपना नाम दिखाने का प्रस्ताव करेगा। मुझे निर्दोष जानते हुए वह कभी मुझे जेल न जाने