पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/११६

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११२ मानसरोवर a देवी-एक रुपये मे तुम्हारा काम चल जायगा मुन्नू-भला सरकार, दो रुपये तो दे दें। देवी-अच्छा, यह लो और जाओ। मुन्नू ~ जाता हूँ सरकार ! आप नाराज न हों, तो एक बात पू ? देवी-क्या पूछते हो, पूछो ; मगर जल्दी, मुझे चूल्हा जलाना है। मुन्नू- तो सरकार जायँ, फिर कभी कहूँगा । देवी-नहीं-नहीं, क्हो, क्या बात है ? अभी कुछ ऐसी जत्दी नहीं है। मुन्नू-दालमण्डी में सरकार के कोई रहते हैं क्या ? देवी-नहीं, यहाँ तो कोई नातेदार नहीं है। मुन्न - तो कोई दोस्त होंगे । सरकार को अक्सर एक कोठे पर से उतरते देखता हूँ। देवी-दालमण्डी तो रण्डियों का मुहल्ला है ? सुनन्-हाँ सरकार, रण्डियाँ बहुत हैं वहाँ , लेकिन सरकार तो सीधे-सादे आदमी मालूम होते हैं । यहाँ रात को देर से तो नहीं आते ? देवी-नहीं, शाम होने से पहले ही आ जाते हैं और फिर कही नही जाते। हाँ, कभी-कभी लाइब्रेरी अलबत्ता जाते हैं मुन्नू-वस-बस, यही बात है हजूर । मौका मिले, तो इशारे से समझा दीजिएगा सरकार, कि रात को उधर न जाया करें। आदमी का दिल कितना ही साफ हो , लेकिन देखनेवाले तो शक करने लगते हैं। इतने ही में बाबू श्यामकिशोर आ गये । मुन्नू ने उन्हे सलाम किया, वालटी उठाई और चलता हुआ। श्यामकिशोर ने पूछा- मुन्नू क्या कह रहा था ? देवी-कुछ नहीं, अपने दुखड़े रो रहा था । खाने को माँगता था। दो रुपये दे दिये हैं। बातचीत बड़े ढग से करता है। श्याम -तुम्हें तो बातें करने का मरज़ है । और कोई नहीं, मेहतर ही सही। इस भुतने से न-जाने तुम कैसे बाते करती हो ! देवी-मुझे उसकी सूरत लेकर क्या करना है। गरीब आदमी है। अपना दुख सुनाने लगता है, तो कैसे न सुनूं ?