पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/११९

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लाछन ११५ श्याम०- 1 श्याम०- दरवाजे पर पड़ा रहूँ और एक टुकड़ा खा लिया करूँ । सच कहता हूँ, हजूर को देख- कर भूख-प्यास जाती रहती है। मुन्नू जा ही रहा था कि बाबू श्यामकिशोर ऊपर आ पहुँचे । मुन्नू की पिछली बात उनके कानों में पड़ गई थी। मुन्नू ज्योही नीचे गया, बाबू साहब देवी से बोले- मैंने तुमसे कह दिया था कि मुन्नू को मुंह न लगाओ , पर तुमने मेरी वात न मानी । छोटे आदमी एक घर की बात दूसरे घर पहुँचा देते हैं, इन्हें कभी मुँह न लगाना चाहिए । भूख-प्यास वन्द होने को क्या वात थी ? दवी-क्या जाने, भूख-प्यास कैसी ? ऐसी तो कोई बात न थी। -थी क्यों नहीं, मैंने साफ सुना ? देवो -मुझे तो खयाल नहीं आता । होगी कोई बात । मैं कौन उसकी सब बातें बैठी सुना करती हूँ। -तो क्या वह दीवार से बातें करता है ? देखो, नीचे कोई आदमी इस खिड़की की तरफ ताकता चला जाता है। इसी महल्ले का एक मुसलमान लौंडा है। जूते की दूकान करता है । तुम क्या इस खिड़की पर खड़ी रहा करती हो ? देवी-चिक तो पड़ी हुई है। श्याम चिक के पास खड़े होने से बाहर का आदमी तुम्हें साफ देख सकता है। देवी - यह मुझे मालूम न था । अब कभी खिड़की खोलेगी ही नहीं। हाँ, क्या फायदा ? मुन्नू को अन्दर मत आने दिया करो। देवो-गुसलखाना कौन साफ करेगा ? श्याम०- -खैर आये, मगर उससे तुम्हें वातें न करनी चाहिए। आज एक नया थिएटर आया है। चलो, देख आयें। सुना है, इसके ऐक्टर बहुत अच्छे हैं। इतने में शारदा नीचे से मिठाई का एक दोना लिये दौड़ती हुई आई। देवी ने पूछा - अरी, यह मिठाई किसने दी ? शारदा - राजा भैया ने तो दी है। कहते थे-तुमको अच्छे अच्छे खिलौने ला देगा। राजा-भैया कौन है ? शारदा वही तो हैं, जो अभी इधर से गये हैं। श्याम-वही तो नहीं, जो लम्बा-सा साँवले रग का आदमी है ? श्याम.-- 2 / श्याम O