पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१४८

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१४४ मानसरोवर खाना तो मैंने खा लिया-बच्चे शोक में खाना नहीं छोड़ते, खासकर जब रवड़ी भी सामने हो ; मगर बड़ी रात तक पड़े-पड़े सोचता रहा-मेरे पास रुपये होते, तो एक लाख रुपये कजाकी को दे देता और कहता- बाबूजी से कभी मत बोलना । बेचारा भूखों मर जायगा ! देखू, कल आता है कि नहीं। अब क्या करेगा आकर ? मगर आने को तो कह गया है। मैं कल उसे अपने साथ खाना खिलाऊँगा। यही हवाई किले बनाते-बनाते मुझे नींद आ गई। (३ ) दूसरे दिन मैं दिन-भर अपने हिरन के बच्चे के सेवा-सत्कार में व्यस्त रहा। पहले उसका नामकरण-सस्कार हुआ। 'मुन्नू' नाम रखा गया। फिर मैंने उसका अपने सब हमजोलियों और सहपाठियों से परिचय कराया। दिन ही भर में वह मुझ से इतना हिल गया कि मेरे पीछे-पीछे दौड़ने लगा। इतनी ही देर में मैंने उसे अपने जीवन में एक महत्त्व-पूर्ण स्थान दे दिया। अपने भविष्य में वननेवाले विशाल भवन में उसके लिए अलग कमरा बनाने का भी निश्चय कर लिया ; चारपाई, सैर करने की फिटन आदि की भी आयोजना कर ली। लेकिन संध्या होते ही मैं सब कुछ छोड़-छाड़कर सड़क पर जा खड़ा हुआ और कजाको की बाट जोहने लगा। जानता था, कजाकी निकाल दिया गया है, अब उसे कोई ज़रूरत नहीं रही। फिर भी न-जाने क्यों मुझे यह आशा हो रही थी कि वह आ रहा है। एकाएक मुझे खयाल आया कि कजाकी भूखों मर रहा होगा। मैं तुरन्त घर आया । अम्माँ दिया-वत्ती कर रही थीं। मैंने चुपके से एक टोकरी में आटा निकाला, आटा हाथों में लपेटे, टोकरी से गिरते आटे की एक लकीर बनाता हुआ भागा। आकर सड़क पर खड़ा हुआ ही था कि कजाकी सामने से आता दिखलाई दिया। उसके पास बल्लम भी था, कमर में चपरास भी थी, सिर पर साफा भी बंधा हुआ था । बल्लम में डाक का थैला भी बंधा हुआ था। मैं दौड़कर उसकी कमर से चिपट गया और विस्मित होकर बोला-तुम्हें चपरास और बल्लम कहाँ से मिल गया, कजाकी ? कजाकी ने मुझे उठाकर कन्धे पर बैठालते हुए कहा- वह चपरास किस काम की थी, भैया। वह तो गुलामी की चपरास थी, यह अपनी खुशी की चपरास है। पहले सरकार का नौकर था, अब तुम्हारा नौकर हूँ। यहाँ आने