पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१७२

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१६८ मानसरोवर था। चैत के अंत तक उसका यही नियम रहता था। आजकल वही दिन थे। फसल पकी हुई तैयार खड़ी थी। दो-चार दिन में कटाई शुरू होनेवाली थी । पयाग ने दस वजे रात तक रुक्मिन की राह देखी। फिर यह समझकर कि शायद किसी पड़ोसिन के घर सो रही होगी, उसने खा-पीकर अपनी लाठी उठाई और सिलिया से वोला- किवाड़ बद कर ले, अगर रुक्मिन आये तो खोल देना और मना-जुनाकर थोड़ा- बहुत खिला देना । तेरे पीछे आज इतना तूफान हो गया। मुझे न-जाने इतना गुस्सा कैसे आ गया। मैंने उसे कभी फूल की छड़ी से भी न छुआ था। कहीं वूड-धंस न मरी हो, तो कल आफत आ जाय । सिलिया बोली-न-जाने वह आयेगी कि नहीं। मैं अकेली कैसे रहूँगी । मुझे डर लगता है। "तो घर में कौन रहेगा। सूना घर पाकर कोई लोटा-थाली उठा ले जाय तो ? डर किस बात का है ? फिर रुक्मिन तो आती ही होगी।" सिलिया ने अदर से टट्टी बंद कर ली । पयाग हार की ओर चला । चरम की तरंग मे यह भजन गाता जाता था - टगिनी क्या नैना झमकावे । कट्टू काट मृदग बनावे, नीबू काट मजीरा , पाँच तरोई मगल गावें, नाचे दालम खीरा । रूपा पहिरके रूप दिखावे, सोना पहिर रिझावे; गले डाल तुलसी की माला, तीन लोक भरमावे । ठगिनी०। सहसा सिवाने पर पहुँचते ही उसने देखा कि सामने हार मे किसी ने आग जलाई । एक क्षण में एक ज्वाला-सी दहक उठी । उसने चिल्लाकर पुकारा-कौन है वहाँ ? अरे, यह कौन आग जलाता है ? ऊपर उठती हुई ज्यालाओं ने अपनी आग्नेय जिह्वा से उत्तर दिया । अव पयाग को मालूम हुआ कि उसकी मड़ेया में आग लगी हुई है। उसकी छाती धड़कने लगी। इस मडैया में आग लगना रुई के ढेर में आग लगना था। हवा चल रही थी। मडैया के चारों ओर एक हाथ हटकर पकी हुई फसल की चादरें-सी