पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१७८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१७४ मानसरोवर लिए अनिवार्य है । खान-पान में भी उसे बहुत विचार रखना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह है कि झूठ का त्याग करना पड़ता है । भगत झूठ नहीं बोल सकता। साधा- रण मनुष्य को अगर झूठ का दड एक मिले, तो भगत को एक लाख से कम नहीं मिल सकता । अज्ञान की अवस्था में कितने ही अपराध क्षम्य हो जाते हैं । ज्ञानी के लिए क्षमा नहीं है, प्रायश्चित्त नहीं है, या तो बहुत ही कठिन। सुजान को भी अब भगतों की मर्यादा को निभाना पड़ा। अव तक उसका जीवन मजूर का जीवन था उसका कोई आदर्श, कोई मर्यादा उसके सामने न थी। अव उसके जीवन में विचार का उदय हुआ, जहाँ का मार्ग काँटों से भरा हुआ है । स्वार्थ-सेवा ही पहले उसके जीवन का लक्ष्य था, इसी कोटे से वह . परिस्थितियों को तौलता था। वह अब उन्हें औचित्य के कॉटो पर तौलने लगा। यों कहो कि जड़-जगत् से निकलकर उसने चेतन-जगत् में प्रवेश किया। उसने कुछ लेन-देन करना शुरू किया था, पर अब उसे ब्याज लेते हुए आत्मग्लानि-सी होती थी। यहाँ तक कि गउओं को दुहाते समय उसे बछड़ों का ध्यान बना रहता था - कहीं बछड़ा "भूखा न रह जाय, नहीं उसका रोयाँ दुखी होगा। वह गांव का मुखिया था, कितने ही मुकदमों मे उसने झूठी शहादतें बनवाई थीं, कितनों से डाँड़ लेकर मामले को रफा- दफा करा दिया था। अब इन व्यापारों से उसे घृणा होती थी। झूठ और प्रपच से कोसों भागता था। पहले उसकी यह चेष्टा होती थी कि मजूरों से जितना काम लिया जा सके, लो और मजूरी जितनी कम दी जा सके, दो, पर अब उसे मजूरी के काम की कम मजूरी की अधिक चिन्ता रहती थी-कहीं बेचारे मजूर का रोयों न दुखी हो जाय। यह उसका सखुतन किया सा हो गया -किसी का रोयाँ न दुखी हो जाय । उसके दोनों जवान बेटे वात-बात में उस पर फब्तियां कसते, यहाँ तक कि बुलाकी भी अब उसे कोरा भगत समझने लगी, जिसे घर के भले-बुरे से कोई प्रयोजन न था। चेतन-जगत् में ओकर सुजान भगत कोरे भगत रह गये। सुजान के हाथों से धीरे-धीरे अधिकार छीने जाने लगे। किस खेत में क्या चोना है, किसको क्या देना है, किससे क्या लेना है, किस भाव क्या चीज़ विकी, ऐसी- ऐसी महत्त्व-पूर्ण वातों में भी भगतजी की सलाह न ली जाती। भगत के पास कोई जाने ही न पाता । दोनों लड़के या स्वय बुलाकी दूर ही से मामला कर लिया करती । गाँव भर में सुजान का मान-सम्मान वढता था, अपने घर में घटता था। लड़के उसका सत्कार अव बहुत करते। हाथ से चारपाई उठाते देख लपकर खुद उठा लाते, उसे