पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/१८०

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मानसरोवर सुनाई नहीं देता कि द्वार पर कौन घटे-भर से खड़ा भीख मांग रहा है। अपना काम तो दिन-भर करना ही है, एक छन भगवान् का काम भी तो किया करो। वुलाकी-तुम तो भगवान् का काम करने को बैठे ही हो, क्या घर-भर भग- वान् ही का काम करेगा? सुजान-कहाँ आटा रखा है, लाओ, मै ही निकालकर दे आऊँ। तुम रानी बनकर बैठो। बुलाकी-आटा मैने मर-मरकर पीसा है, अनाज दे दो। ऐसे मुद्दचिरो के लिए पहर रात से उठकर चक्की नहीं चलाती हूँ। सुजान भंडार-घर में गये और एक छोटी-सी छबढ़ी को जौ से भरे हुए निकले। जौ सेर-भर से कम न था । सुजान ने जान-बूझकर, केवल बुलाकी और भोला को चिढ़ाने के लिए, भिक्षा-परपरा का उल्लघन किया था। तिस पर भी यह दिखाने के लिए कि छबड़ी में बहुत ज्यादा जो नहीं हैं, वह उसे चुटको से पकड़े हुए थे । चुटकी इतना बोझ न संभाल सकती थी। हाथ कांप रहा था । एक क्षण का विलब होने से छबड़ी के हाथ से छूटकर गिर पड़ने की सभावना थी। इसलिए वह जल्दी से बाहर निकल जाना चाहते थे। सहसा भोला ने छबड़ी उनके हाथ से छीन ली और त्यौरियां बदलकर बोला-संत का माल नहीं है, जो लुटाने चले हो । छाती फाड़-फाड़कर काम करते हैं, तब दाना घर में आता है। सुजान ने खिसियाकर कहा- मैं भी तो बैठा नहीं रहता। भोला-भीख भीख की तरह दी जाती है, लुटाई नहीं जाती । हम तो एक बेला खाकर दिन काटते हैं कि पति-पानी बना रहे और तुम्हें लुटाने को सूझी है। तुम्हें क्या मालूम कि घर में क्या हो रहा सुजान ने इसका कोई जवाब न दिया । वाहर आकर भिखारी से कह दिया - वावा, इस समय जाओ, किसी का हाथ खाली नहीं है और पेड़ के नीचे बैठकर विचारों में मग्न हो गया। अपने ही घर में उसका यह अनादर ! अभी वह अपाहिज नहीं है, हाथ-पांव थके नहीं है, घर का कुछ-न-कुछ काम करता ही रहता है। उस पर यह अनादर ! उसी ने यह घर बनाया, यह सारी विभूति उसी के श्रम का फल है, पर अब इस घर पर उसका कोई अधिकार नहीं रहा । अव वह द्वार का कुत्ता है, पड़ा रहे और 1