पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२२४

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आत्म-सगीत - (१) आवारात थी। नदी का किनारा था। आकाश के तारे स्थिर थे और नदी में उनका प्रतिविम्व लहरों के साथ चचल । एक स्वर्गीय सङ्गीत की मनोहर और जीवन- दायिनी, प्राणपोषिणी ध्वनियां इस निस्तब्ध और तमोमय दृश्य पर इस प्रकार छा रही थीं-जैसे हृदय पर आशाएँ छाई रहती हैं, या मुखमण्डल पर शोक । रानी मनोरमा ने आज गुरु-दीक्षा ली थी। दिन-भर दान और व्रत में व्यस्त रहने के बाद मीठी नींद को गोद में सो रही थी। अकस्मात् उसकी आँखें खुली और ये मनोहर ध्वनियाँ कानों मे पहुंचीं। वह व्याकुल हो गई:-जैसे दीपक को देखकर पतज , वह अधीर हो उठी - जैसे खाँड़ की गन्ध पाकर चींटी। वह उठी और द्वार- पालों, चौकीदारों की दृष्टियां बचाती हुई राजमहल से बाहर निकल आई-जैसे वेदना- पूर्ण क्रन्दन सुनकर आँखों से आंसू निकल आते हैं। सरिता-तट पर कॅटीली झाड़ियां थीं। ऊँचे कगारे थे। भयानक जन्तु थे और उनकी डरावनी आवाजें, शव थे और उनसे भी अधिक भयङ्कर उनकी कल्पना । मनोरमा कोमलता और सुकुमारता की मूर्ति थी। परन्तु उस मधुर सङ्गीत का आकर्षण उसे तन्मयता की अवस्था में खींचे लिये जाता था। उसे आपदाओं का ध्यान न था । वह घण्टों चलती रही, यहाँ तक कि मार्ग में नदी ने उसका गति रोध किया। (२) मनोरमा ने विवश होकर इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई । किनारे पर एक नौका दिखाई दी। निकट जाकर बोली-मांझी, मैं उस पार जाऊँगी, इस मनोहर राग ने मुझे व्याकुल कर दिया है। मांझी- रात को नाव नहीं खोल सकता । हवा तेज़ है, लहरें डरावनी । जान- जोखिम है।