पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२३५

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. ऐक्ट्स कुंवर साहब देर तक अपने दिल की बातें कहते रहे। उनकी वाणी कभी इतनी प्रगल्भ न हुई थी। तारा सिर झुकाये सुनती थो, पर आनद की जगह उसके मुख पर एक प्रकार का क्षोभ, लज्जा से मिला हुआ, अकित हो रहा था। यह पुरुष इतना सरल हृदय, इतना निष्कपट है । इतना विनीत, इतना उदार ! सहसा कुँवर साहब ने पूछा-तो मेरे भाग्य किस दिन उदय होंगे, तारा ? दया करके बहुत दिनों के लिए न टालना । तारा ने कुँवर साहब की सरलता से परास्त होकर चितित स्वर में कहा कानून को क्या कीजिएगा ? कुँवर ने तत्परता से उत्तर दिया इस विषय में तुम निश्चित रहो तारा, मैंने वकीलों से पूछ लिया है। एक क़ानून ऐसा है, जिसके अनु- सार हम और तुम एक प्रेम-सूत्र में बँध सकते हैं। उसे सिविल मैरिज कहते हैं । बस, आज ही के दिन वह शुभ मुहूर्त आयेगा, क्यों ? तारा सिर झुकाये रही । कुछ बोल न सकी। "मैं प्राताकाल आ जाऊँगा । तैयार रहना।" तारा सिर झुकाये ही रहो । मुँह से एक शब्द भी न निकला। कुँवर साहब चले गये, पर तारा वहीं, मूर्ति की भांति, बैठी रहो। पुरुषो के हृदय से क्रोड़ा करनेवाली चतुर नारी क्यों इतनी विमूढ़ हो गई है। - विवाह का एक दिन और वाक़ी है । तारा को चारों ओर से वधाइयाँ मिल रही हैं। थिएटर के सभी स्त्री-पुरुषों ने अपने सामर्थ्य के अनुसार उसे अच्छे-अच्छे उप- हार दिये हैं, कुँवर साहव ने भी आभूषणों से सजा हुआ एक सिंगारदार भेंट किया है, उनके दो-चार अतरग मित्रों ने मांति-भांति के सौगात भेजे हैं, पर तारा के सुन्दर मुख पर हर्ष की रेखा भो नहीं नज़र आती। वह क्षुव्य और उदास है । उसके मन में चार दिनों से निरतर यही प्रश्न उठ रहा है-क्या कुँवर के साथ वह विश्वास- घोत करे ? जिस प्रेम के देवता ने उसके लिए अपने कुल मर्यादा को तिलांजलि दे दो, अपने वधुजनों से नाता तोड़ा, जिसका हृदय हिमकण के समान निष्कलक है, पर्वत के समान विशाल, उसीसे वह कपट करे । नहीं, वह इतनी नीचता नहीं कर सकती, अपने जीवन में उसने कितने ही युवकों से प्रेम का अभिनय किया था, कितने ही