पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२३९

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ऐक्ट्रेस २५ मगर दूनी मज़दूरी की बात सुनकर उसने डाँडा उठाया और नाव को खोलता हुआ बोला सरकार, उस पार कहाँ जैहैं ? "उस पार एक गांव में जाना है।" "मुदा इतनी रात गये कौनो सवारी-सिकारी न मिली।" "कोई हर्ज नहीं, तुम मुझे उस पर पहुँचा दो।" मांझी ने नाव खोल दी । तारा उस पार जा बैठी, और नौका मद गति से चलने लगी, मानो जीव स्वप्न मात्राज्य में विचर रहा हो। इसी समय एकादशी का चाँद, पृथ्वी के उस पार, अपनी उज्ज्वल नौका खेता हुआ निकला और व्योम-सागर को पार करने लगा।