पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२४४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२४० मानसरोवर खजाने की कुञ्जी निकालकर फेंक दी, बही-खाते पटक दिये, किवाड़ धड़ाके से बन्द किये और हवा की तरह सन्न से निकल गये। कपट में हाथ तो डाला ; पर कपट मन्त्र न जाना। दूसरे कारिन्दों ने यह कैफियत सुनी, तो फूले न समाये । मुशीजी के सामने उनकी दाल न गलने पाती थी। भानुकुंवरि के पास आकर वे आग पर तेल छिड़कने लगे । सव लोग इस विषय में सहमत थे कि मुशी सत्यनारायण ने विश्वासघात किया है । मालिक का नमक उनकी हड्डियों से फूट-फूटकर निकलेगा । दोनों ओर से मुकदमेबाजी को तैयारियां होने लगों। एक तरफ न्याय का शरीर था, दूसरी ओर न्याय की आत्मा । प्रकृित का पुरुष से लड़ने का साहस हुआ ।' भानुकुवरि ने लाला छक्कनलाल से पूछा-हमारा वकील कौन है ? छक्कनलाल ने इधर-उधर झाँककर कहा-वकोल तो सेठजो हैं , पर सत्यनारायण ने उन्हें पहले ही 'गाँठ रखा होगा। इस मुकदमे के लिए बड़े होशियार् वकील की ज़रूरत है। मेहरा वाबू की आजकल खूब चल रही है। हाकिम की कलम पकड़ लेते हैं। वोलते हैं तो जैसे मोटरकार छूट जाती है । सरकार ! और क्या कहें, कई आदमियों को फांसी से उतार लिया है, उनके सामने कोई वकील जवान तो खोल नहीं सकता। ' सरकार कहे तो वही कर लिये जायें। छक्कनलाल की अत्युक्ति ने सन्देह पैदा कर दिया । भानुकुंवरि ने कहा--नहीं, पहले सेठजी से पूछ लिया जाय। उसके बाद देखा जायगा। आप जाइए, उन्हें बुला लाइए। छक्कनलाल अपनी तकदीर को ठोकते हुए सेठजी के पास गये। सेठजी पण्डित .. मृगुदत्त के जीवन-काल से ही उनका कानून-सम्वन्धी सब काम किया करते थे। मुक्त- दमे का हाल सुना तो सन्नाटे में आ गये । सत्यनारायण को वह बड़ा नेकनीयत आदमी समझते थे। उनके पतन पर वड़ा खेद हुआ। उसी वक्त आये। भानुकुवरि ने रो- रोकर उनसे अपनी विपत्ति की कथा कही और अपने दोनों लड़कों को उनके सामने खड़ा करके बोली-आप इन अनार्थों की रक्षा कीजिए ! इन्हें मैं आपको सौंपती हूँ। सेठजी ने समझौते की बात छेड़ी । बोले-आपस की लड़ाई अच्छी नहीं । भानुकुँवरि-अन्यायी के साथ लड़ना ही अच्छा है। सेठजी~पर हमारा पक्ष निर्बल है । ।