पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२४७

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ईश्वरीय न्याय २४३ पड़े। मारे डर के छाती धड़कने लगी । आन पड़ा कि कोई छिपा वैठा है। कदम रुक गये। पुआल की तरफ ध्यान से देखा । उसमें विलकुल हरकत न हुई। तव हिम्मत बोधी, आगे वढे और मन को समझाने लगे-मैं कैसा वौखला हूँ। । अपने द्वार पर किसको डर और सड़क पर भी मुझे किसका डर है ? मैं अपनी राह जाता है। कोई मेरी तरफ तिरछो आँख से नहीं देख सकता । हाँ, जब मुझे सेंध लगाते देख ले नहीं , पकड़ ले-तव अलवत्ते डरने की बात है । तिसपर भी बचाव की युक्ति निकल सकती है। अकस्मात् उन्होंने भानुकुंवरि के एक चपरासी को आते हुए देखा । कलेजा धड़क उठा। लपककर एक अन्धेरी गली में घुस गये। बड़ी देर तक वहां खड़े रहे। जब वह सिपाही आँखों से ओझल हो गया, तब फिर सड़क पर आये। वह सिपाही आज सुबह तक इनका गुलाम था, उसे इन्होंने कितनी ही वार गालियां दी थीं, लातें भी मारी थीं , पर आज उसे देखकर उनके प्राण सूख गये। उन्होंने फिर तर्क की शरण ली । मैं मानो भग खाकर आया हूँ। इस चपरासी से इतना डरा । माना कि वह मुझे देख लेता, पर मेरा कर क्या सकता था। हजारों आदमी रास्ता चल रहे हैं । उन्हों में मैं भी एक हूँ । क्या वह अन्तर्यामी है ? सबके हृदय का हाल जानता है ? मुझे देखकर वह अदव से सलाम करता और वहाँ का कुछ हाल भी कहता , पर मैं उससे ऐसा डरा कि सूरत तक न दिखाई । इस तरह मन को समझा- कर वे आगे बढ़े। सच है, पाप के पक्षों में फंसा हुआ मन पतझड़ का पत्ता है, जो हवा के जरा-से झोंके से गिर पड़ता है। मु शोजी वाजार पहुँचे। अधिकतर दूकानें वन्द हो चुकी थीं। उनमें सांड़ और गायें वठी हुई जुगाली कर रही थीं। केवल हलवाइयों की दुकानें खुली थी और कहीं- कहीं गजरेवाले हार को हाक लगाते फिरते थे। सव हलवाई मु शीजो को पहचानते थे , अतएव मु शीजी ने सिर झुका लिया। कुछ चाल बदली और लपकते हुए चले । एकाएक उन्हें एक बग्घी आतो दिखाई दो। यह सेठ वल्लभदास वकील की बग्घी थी। इसमें बैठकर हजारो वार सेठजो के साथ कचहरी गये थे , पर आज वह बग्घी काल- देव के समान भयकर मालूम हुई । फौरन एक खाली दुकान पर चढ गये । वहाँ विश्राम करनेवाले सांड़ ने समझा ये मुझे पदच्युत करने आये हैं। माधा झुकाये, फुकारता हआ उठ बैठा, पर इमी बीच में बग्घी निकल गइ और नु शोजी को जान-में-जान