पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२४८

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२४४ मानसरोवर आई । अवको उन्होंने तर्क का आश्रय न लिया । समझ गये कि इस समय इससे कोई लाभ नहीं, खैरियत यह हुई कि वकील ने देखा नहीं । वह एक धाघ है। मेरे चेहरे से ताइ जाता। कुछ विद्वानों का कथन है कि मनुष्य को स्वाभाविक प्रवृत्ति पाप की और होती है, पर यह कोरा अनुमान-ही-अनुमान है, अनुभव-सिद्ध वात नहीं। सच बात तो यह है कि मनुष्य स्वभावतः पापभीरु होता है और हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि पाप से उसे कैसी घृणा होती है। एक फर्लान आगे चलकर मुंशीजी को एक गली मिली। यह भानकुँवरि के घर का रास्ता था । धुंधली-सी लालटेन जल रही थी। जैसा मुंशीजी ने अनुमान किया था, पहरेदार का पता न था। अस्तबल में चमारों के यहाँ नाच हो रहा था। कई चमारिने बनाव-सिंगार करके नाच रही थीं। चमार मृदग वजा-बजाकर गाते थे- "नाही घरे स्याम. घेरि आये बदरा । सोवत रहेउँ सपन एक देखेउँ रामा, युलि गई नींद ढरक गये कजरा । नाहीं घरे श्याम, घेरि आये बदरा ।" दोनों पहरेदार वहीं तमाशा देख रहे थे। मुंशीजी दबे-पाँव लालटेन के पास गये, और जिस तरह बिल्ली चूहे पर झपटती हैं, उसी तरह उन्होंने झपटकर लालटेन को बुझा दिया । एक पड़ाव पूरा हो गया, पर वे उस कार्य को जितना दुष्कर समझते थे, उतना न जान पड़ा । हृदय कुछ मजबूत हुआ। दफ्तर के बरामदे में पहुँचे और खूब कान लगाकर आहट ली। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। केवल चमारों का कोलाहल सुनाई देता था। इस समय मु शीजी के दिल में धड़क न थी, पर सिर धमधम कर रहा था; हाथ-पाँव काँप रहे थे, सांस बड़े वेग से चल रही थी। शरीर का एक-एक रोम आँख और कान बना हुआ था। वे सजीवता की मूर्ति हो रहे थे। उनमें जितना पौरुष, जितनी चपलता, जितना साहस, जितनी चेतना, जितनी बुद्धि, जितना औसान था, वे सब इस वक्त सजग और सचेत होकर इच्छाशक्ति की सहायता कर रहे थे। दफ्तर के दरवाजे पर वही पुराना ताला लगा हुआ था। इसकी कुजी आज बहुत तलाश करके वे बाज़ार से लाये थे। ताला खुल गया, किवाड़ों ने बहुत दबी जबान से !