पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२५

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निमन्त्रण २१ अगर वे होते, तो रंग जम जाता। उनके विना रग फीका रहेगा। यहां दूसरा कौन है, जिसमे लाग-डाट करूं। लड़के दो-दो पत्तलों में चे बोल जायेंगे। सोना कुछ साथ देगी; मगर कब तक ! चिन्तामणि के विना रग न गठेगा। वे मुझे ललकारेंगे, मैं उन्हें ललकारूँगा। उस उमग में पत्तलों को कौन गिनती। हमारो देखा-देखी लड़के भो डट जायेंगे । ओह, बड़ी भूल हो गई। यह खयाल मुझे पहले न आया। रानी साहा से कहूँ, बुरा तो न मानेंगी। उँह ! जो कुछ हो, एक बार ज़ोर तो लगाना ही चाहिए । तुरन्त खडे होकर रानी साहब से बोले--सरकार ! आज्ञा हो, तो कुछ कहूँ। । रानी--कहिए, कहिए महाराज, क्या किसी वस्तु की कमी है ? मोटे-नहीं सरकार, किसी बात की नहीं। ऐसे उत्तम पदार्थ तो मैंने कभी देखें भी न थे। सारे नगर में आपकी कीर्ति फैल जायगी। मेरे एक परम मित्र पण्डित चिन्तामणिजी हैं, आज्ञा हो तो उन्हे भी बुला लूँ। बड़े -विद्वान् कर्मनिष्ठ ब्राह्मण हैं। उनके जोड़ का इस नगर में दूसरा नहीं है। मैं उन्हें निमन्त्रण देना भूल गया। अभी सुध आई है। रानी-आपकी इच्छा हो, तो बुला लीजिए , मगर जाने-आने में देर होगी और भोजन परोस दिया गया है । मोटे-में अभी आता हूँ सरकार, दौड़ता हुआ जाऊँगा। रानी-मेरी मोटर ले लीजिये। जव पण्डितजी चलने को तैयार हुए, तब सोना ने कहा--तुम्हें आज क्या हो गया है जी ! उसे क्यों बुला रहे हो ? मोटे०--कोई साथ देनेवाला भी तो चाहिए ? सोना-में क्या तुमसे दब जाती? पण्डितजी ने मुस्कराकर कहा-तुम जानती नहीं, घर की वात और है ; दाल की बात और । पुराना खिलाड़ी मैदान में जाकर जितना नाम करेगा, उतना नया पट्टा नहीं कर सकता । वहां बल का काम नहीं, साहस का काम है। बस, यहाँ भी वही दाल समझो । आज मण्डे गाड़ दूंगा। समझ लेना। सोना-कहीं लड़के सो जाय तो? मोटे०--और भूख तुल जायगी । जगा तो में लूँगा ।