पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२८३

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मन्त्र २७९ घर से निकल पड़ता था, नि स्वाथ, निष्काम । लेने-देने का विचार कभी दिल में आया ही नहीं। यह ऐसा काम ही न थ। जान का मूल्य कौन दे सकता है ? यह एक पुण्य-कार्य था। सैकड़ों निराशों को उसके मन्त्रों ने जीवन दान दे दिया था , पर आज वह घर से कदम नहीं निकाल सका। यह खबर सुनकर भी सोने जा रहा है। बुडिया ने कहा --तमाखू अंगोठी के पास रखी हुई है। उसके भी आज ढाई पैसे हो गये। देती ही न थी। वुढ़िया यह कहकर लेटी। बूढ़े ने कुप्पी वुझाई, कुछ देर खड़ा रहा, फिर बैठ गया। अन्त को लेट गया, पर यह खबर उसके हृदय पर बोम की भांति रखी हुई थी। उसे मालूम हो रहा था, उसकी कोई चीज खो गई है, जैसे सारे कपड़े गीले हो गये हैं, या पैरों में कोचड़ लगा हुआ है, जैसे कोई उसके मन में वठा हुआ उसे घर से निकलने के लिए कुरेट रहा है। बुड़िया जरा देर में खरटि लेने लगो। बूढ़े बातें करते-करते सोते हैं और जा सा खटका होते ही जागते हैं। तव भगत उठा, अपनी लकड़ी उठा ली, और धीरे से किवाड़ खोले । बुटिया ने पूछा-कहाँ जाते हो ? 'कहीं नहीं, देखता था कितनी गत है।' 'अभी बहुत रात है, सो जाओ।' नींद नहीं आती।' नींद काहे को आयेगी ? मन तो चडढा के घर पर लगा हुआ है। ने मेरे साप कौन-सी नेकी कर दी है जो वहाँ जाऊँ ? वह आकर पैरों पढ़े, तो भी न जाऊँ।' 'उठे तो तुन इसो इराटे से हो ?' 'नहीं री, ऐसा पागल नहीं हूँ कि जो मुझे काटे वोए, उसके लिए फूल बोता फिर बुडिया फिर सो गई। भगत ने किवाड़ लगा दिये और फिर आकर बैठा। पर उसके मन को कुछ वही दशा थी, जो बाजे की आवाज़ कान में पड़ते हो, उपदेश सुननेवालों की होती है। आत चाहे उपदेशक की ओर हों; पर कान वाजे ही को और हते हैं। दिल मे भी दाजे की वदि गूंजता रहती है। सर्म के मारे जगह से 'बडा