पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२८४

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२८. मानसरोवर नहीं उठता। निर्दयी प्रतिघात का भाव भगत के लिए उपदेशक था; पर हृदय उस अभागे युवक की ओर था, जो इस समय मर रहा था, जिसके लिए एक-एक पल का विलम्ब घातक था । उसने फिर किवाड़ खोले, इतने धीरे से कि बुढ़िया को भी खबर न हुई। बाहर निकल आया। उसी वक्त गांव का चौकीदार गश्त लगा रहा था। बोला- कैसे उठे भगत 2 आज.तो बढ़ी सरदी है | कहीं जा रहे हो क्या ? भगत ने कहा-नहीं जी, जाऊँगा कहाँ ! देखता था, अभी कितनी रात है, भला कै बजे होंगे? चौकीदार वोला- एक बजा होगा और क्या, अभी थाने से आ रहा था, तो डाक्टर चड्ढा वाचू के बंगले पर बड़ी भीड़ लगी हुई थी। उनके लड़के का हाल तो तुमने सुना होगा, कीड़े ने छू लिया है । चाहे मर भी गया हो। तुम चले जाओ, तो साइत बच जाय । सुना, दस हजार तक देने को तैयार हैं। भगत-मैं तो न जाऊँ, चाहे वह दस लाख भो दें। मुझे दस हजार या दस लाख लेकर करना क्या है ? कल मर जाउँगा, फिर कौन भोगनेवाला बैठा हुआ है। चौकीदार चला गया। भगत ने आगे पैर बढाया। जैसे नशे में आदमी की देह अपने काबू में नहीं रहती, पर कहीं रखता है, पड़ता कहीं है, कहता कुछ है, जवान से निकलता वुछ है, वही हाल इस समय भगत का था। मन में प्रतीकार था, दम्भ था; पर कर्म मन के अधीन न था। जिसने कभी तलवार नहीं चलाई, वह इरादा करने पर भी तलवार नहीं चला सकता। उसके हाथ कांपते हैं, उठते ही नहीं। भगत लाठी खट-खट करता लपका चला जाता था। चेतना रोकती थी, उपचेतना ठेलती थी। सेवक स्वामी पर हावी था। आधी राह निकल जाने के बाद सहसा भगत रुक गया। हिंसा ने क्रिया पर विनय पाई-मैं यों ही इतनी दूर चला आया। इस जाडे-पाले में मरने की मुझे क्या पड़ी थी ? आराम से सोया क्यों नहीं ? नींद न आती, न सही, दो-चार भजन ही गाता । व्यर्थ इतनी दूर दौड़ा आया। चडढा का लड़का रहे या मरे, मेरी वला से ! मेरे साथ उन्होंने ऐसा कौन-सा सलूक किया था कि मैं उनके लिए मरूँ ? दुनिया में हजारों मरते हैं, हजारों जीते हैं। मुझे किसीके मरने-जीने से मतलब ! मगर उपचेतना ने अब एक दूसरा रूप धारण किया, जो हिंसा से बहुत-कुछ