पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/२९२

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२८८ मानसरोवर भरकर तुरन्त कमरे से निकले और चपरासी को पुकारकर बोले-~-बाबूजी भीतर हैं ? चपरासो आज ठीकेदार से कुछ वसूल करने की खुशी में फूला हुआ था। सामनेवाले तबोली की दुकान से आकर बोला-जी नहीं, कचहरी में किसी से बातें कर रहे हैं। अभी-अभी तो गये हैं। मदारीलाल ने दफ्तर में आकर एक क्लार्क से, कहा-यह मिसिल ले जाकर सेक्रेटरी साहब को दिखाओ। क्लार्क मिसिल लेकर चला गया और जरा देर लौटकर बोला-सेक्रेटरी साहब कमरे में न थे। फाइल मेज पर रख आया हूँ। मदारीलाल ने मुँह सिकोड़कर कहा -कमरा छोड़कर कहां चले जाया करते हैं। किसी दिन धोखा उठायेंगे। क्लार्क ने कहा - उनके कमरे में दफ्तरवालों के सिवा और जाता ही कौन है ? मदारीलाल ने तीव्र स्वर में कहा-तो क्या दफ्तरवाले सब-के-सब देवता हैं ! कब किसकी नीयत बदल जाय, कोई नहीं कह सकता। मैंने छोटो छोटो रकमों पर अच्छो-अच्छों की नीयतें बदलते देखी हैं। इस वक्त हम सभी साह हैं, लेकिन अव- सर पाकर शायद ही कोई चूके। मनुष्य की यही प्रकृति है। आप जाकर उनके कमरे के दोनों दरवाजे बन्द कर दीजिए। क्लार्क ने टालकर कहा - चपरासी तो दरवाजे पर बैठा हुआ है। मदारीलाल ने झुंझलाकर कहा-आपसे मैं जो कहता हूँ वह कीजिए। कहने लगे, चपरासी बैठा हुआ है। चपरासी कोई ऋषि है, मुनि है ? चपरासी ही कुछ उड़ा दे तो आप उसका क्या कर लेंगे ? जमानत भी है तो तीन सौ की। यहाँ एक-एक काराज़ लाखों का है। यह कहकर मदारीलाल खुद उठे और दफ्तर के द्वार दोनों तरफ से बन्द कर दिये। जब ज़रा चित्त शान्त हुआ तब नोटों के पुलिन्दे जेव से निकालकर एक आलमारी में कागजों के नीचे छिपाकर रख दिये। फिर आकर अपने काम में व्यस्त हो गये। सुवोधचन्द्र कोई घटे भर में लोटे तब उनके कमरे का द्वार बन्द था। दफ्तर में आकर मुसकिराते हुए बोले - मेरा कमरा किसने बन्द कर दिया है भाई ? क्या मेरी बेदखली हो गई? 4