पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/३१८

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मानसरोवर 201 2832 (५) बजे थे। साहब खाने की मेज़ पर थे मगर फतहचद ने आज उनके मेज पर से उठ जाने का इन्तजार न किया । खानसामा कमरे से बाहर निकला और वह चिक उठाकर अन्दर गया। कमरा प्रकाश से जगमगा रहा था। जमीन पर ऐसी कालोन बिछी हुई थी, जैसी फतहचद की शादो में नहीं विछी होगी। साहब बहादुर ने उसकी तरफ क्रोधित दृष्टि से देखकर कहा-तुम क्यों आया, बाहर जाओ, क्यों अन्दर चला आया ? फतहचद ने खड़े-खड़े डंडा सँभालकर कहा-तुमने मुझसे अभी फाइल मांगा था, वही फाइल लेकर आया हूँ । खाना खा लो, तो दिखाऊँ । तब तक मैं बैठा हूँ। 'इतमीनान से खाओ, शायद यह तुम्हारा आखिरी खाना होगा। इसी कारण खूब पेट-भर खा लो। साहब सन्नाटे में आ गये। फतहचद की तरफ डर और क्रोव की दृष्टि से देख- कर काँप उठे। फतहचद के चेहरे पर पक्का इरादा झलक रहा था । साहब समझ गये, यह मनुष्य इस समय मरने-मारने के लिए तैयार होकर आया है। ताकत में फतह- चद उनके पासग भो नहीं था। लेकिन यह निश्चय था कि वह ईंट का जवाब पत्थर से नहीं, बल्कि लोहे से देने को तैयार है। यदि वह फतहचद को बुरा भला कहते हैं, तो क्या आश्चर्य है कि वह डण्डा लेकर पिल पड़े। हाथापाई करने मे यद्यपि उन्हें जीतने में ज़रा भी सन्देह नहीं था लेकिन वैठे-विठाये डण्डे खाना भो तो कोई बुद्धिमानी नहीं है। कुत्ते को आप डण्डे से सारिए, ठुकराइए, जो चाहे कीजिए ; मगर उसी समय तक, जब तक वह गुर्राता नहीं। एक बार गुर्राकर दौड़ पड़े, तो फिर देखें, आ की हिम्मत कहाँ जातो है ? यही हाल उस वक्त साहव वहादुर का था। जब तक यकीन था कि फतहचद धुडको, धुरको, हण्टर, ठोकर सब कुछ खामोशी से सह लेगा, तब तक आप शेर थे; अब वह त्योरियाँ वदले, डण्डा सँभाले, बिल्ली की तरह घात लगाये खड़ा है। ज़बान से कोई कड़ा शब्द निकला और उसने डण्डा चलाया। वह अधिक से अधिक उसे वरखास्त कर सकते हैं। अगर मारते हैं, तो मार खाने का भी डर उस पर फौजदारी में मुकदमा दायर हो जाने का अदेशा- माना कि वह अपने प्रभाव और ताकत से अन्त में फतहचद को जेल में डलवा देंगे, परन्तु परेशानी और बदनामी से किसी तरह न वच सकते थे। एक बुद्धिमान, और 9