पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/५४

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मानसरोवर

के सिवा दूसरा कोई उपाय न सूझता था, और भिक्षा उन्होंने कभी माँगी न थी। वह चदे जमा कर चुके थे, एक-एक में बार हजारों वसूल कर लेते थे ; पर वह दूसरी बात थी। धर्म के रक्षक, जाति के सेवक और दलितों के उद्धारक वनकर चदा लेने में एक गौरव था, चदा लेकर वह देनेवालों पर एहसान करते थे, पर यहाँ तो भिखारियों की भांति हाथ फैलाना, गिड़गिड़ाना और फटकारें सहनी पड़ेगी। कोई कहेगा-इतने मोटे-ताजे तो हो, मिहनत क्यों नहीं करते, तुम्हें भीख मांगते शर्म भी नहीं आती 2 कोई कहेगा - घास खोद लाओ, मैं तुम्हें अच्छी मजदूरी दूंगा। किसी को उनके ब्राह्मण होने का विश्वास न आयेगा । अगर यहाँ उनकी रेशमी अचकन और रेशमी साफा होता, केसरिया रगवाला दुपट्टा ही मिल जाता, तो वह कोई स्वाग भर लेते । ज्योतिषी बनकर वह किसी धनी सेठ को फांस सकते थे, और इस फन में वह उस्ताद भी थे ; पर यहाँ वह सामान कहाँ-कपड़े-लत्ते तो सब लुट चुके थे। विपत्ति में कदाचित् वुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है । अगर वह मैदान में खड़े होकर कोई मनोहर व्याख्यान दे देते, तो शायद उनके दस-पाँच भक्त पैदा हो जाते , लेकिन इस तरफ उनका ध्यान ही न गया। वह. सजे हुए पडाल में, फूलों से सुसज्जित मेज़ के सामने, मच पर खड़े होकर अपनी वाणी का चमत्कार दिखला सकते थे। इस दुरवस्था में कौन, उनका व्याख्यान सुनेगा 2 लोग समझेगे, कोई पागल बक रहा है। मगर दोपहर ढली जा रही थी, अधिक सोच-विचार का अवकाश न था। यही सन्ध्या हो गई, तो रात को लौटना असम्भव हो। जायगा । फिर रोगियों की न जाने क्या दशा हो, वह अब इस अनिश्चित दशा में खड़े न रह सके। चाहे जितना तिरस्कार हो, कितना ही अपमान सहना पड़े भिक्षा के सिवा और कोई उपाय न था। वह बाजार में जाकर एक दूकान के सामने खड़े हो गये ; पर कुछ मांगने की हिम्मत न पड़ी। दूकानदार ने पूछा-क्या लोगे ?, पण्डितजी वोले-चावल का क्या भाव है ? मगर दूसरी दूकान पर पहुँचकर वह ज्यादा सावधान हो गये। सेठजी गद्दी पर बैठे हुए थे। पण्डितजी आकर उनके सामने खड़े हो गये, और गीता का एक