पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/६२

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मानसरोवर का एक दल सिर पर आ पहुंचा। कुंअर ने उस पौधे के आस-पास फूल-पत्ते लगाकर एक फुलवाड़ी-सी बना दी थी। पौधे को सींचना अब उनका काम था। प्रातःकाल वह कन्धे पर कॉवर रखे नदी से पानी ला रहे थे, कि दस-बारह आदमियों ने उन्हें रास्ते में घेर लिया। कुबेरसिह तलवार लेकर दौड़ा; लेकिन शत्रुओं ने उसे मार गिराया। अकेला, शस्त्रहीन कुँअर क्या करता । कन्धे पर काँवर रखे हुए बोला- अव क्यों मेरे पीछे पड़े हो, भाई ? मैंने तो सब कुछ छोड़ दिया। सरदार बोला- हमें आपको पकड़ ले जाने का हुक्म है । 'तुम्हारा स्वामी मुझे इस दशा में भी नहीं देख सकता ? खैर, अगर धर्म समझो तो कुबेरसिह की तलवार मुझे दे दो। अपनी स्वाधीनता के लिए लड़कर प्राण दूं।' इसका उत्तर यही मिला कि सिपाहियो ने कुँअर को पकड़कर मुश्के कस दी और उन्हें एक घोड़े पर बिठाकर घोड़े को भगा दिया । कांवर वहीं पड़ी रह गई। उसी समय चन्दा घर से निकली। देखा-कांवर पड़ी हुई है और कुँअर को लोग घोड़े पर बिठाये लिये जा रहे हैं । चोट खाये हुए पक्षी की भाँति वह कई कदम दौडी, फिर गिर पडी। उसकी आँखों में अंधेरा छा गया । सहसा उसकी दृष्टि पिता की लाश पर पडी । वह घवडाकर उठी और लाश के पास जा पहुँची । कुबेर अभी मरा न था । प्राण आँखों में अटके हुए, थे चन्दा को देखते ही क्षीण स्वर में बोला-बेटी.. कुँअर ! इसके आगे वह कुछ न कह सका । प्राण निकल गये , पर इस एक शब्द-'कुँअर'-ने उसका आशय प्रकट कर दिया। ! बीस वर्ष बीत गये ! कुँअर कैद से न छूट सके । यह एक पहाड़ी किला था। जहाँ तक निगाह जाती, पहाड़ियाँ ही नज़र आतीं। किले में उन्हें कोई कष्ट न था। नौकर-चाकर, भोजन-वस्त्र, सैर-शिकार, किसी वात की कमी न थी। पर, उस वियोगाग्नि को कौन शान्त करता, जो नित्य कुँअर के हृदय में जला करती थी। जीवन में अब उनके लिए कोई आशा न थी, कोई प्रकाश न था । अगर कोई इच्छा थी, तो यही कि एक बार उस प्रेम-तीर्थ की यात्रा कर ले, जहाँ उन्हें वह सब कुछ मिला, जो मनुष्य को मिल सकता है। हाँ, उनके मन में एकमात्र यही अभिलाषा थी कि उस पवित्र स्मृतियों से रजित भूमि के