पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/७६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


मानसरोवर छपाछप चलती रहीं। फिर सन्नाटा हो गया। उधर वे तीनों आहत होकर गिर पड़े, इधर यह भी जख्मों से चूर होकर अचेत हो गया। प्रातःकाल चिन्ता उठी, तो चारों जवानों को भूमि पर पड़े पाया। उसका कलेजा धक से हो गया। समीप जाकर देखा-तीनों आक्रमणकारियों के प्राण निकल चुके थे ; पर रत्नसिंह की साँस चल रही थी। सारी घटना समझ में आ गई। नारीत्व ने वीरत्व पर विजय पाई। जिन आँखों से पिता की मृत्यु पर आँसू की एक बूंद भी न गिरी थी, उन्हीं आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उसने रत्नसिंह का सिर अपनी जांघ पर रख लिया, और हृदयांगण में रचे हुए स्वयवर में उसके गले में जयमाल डाल दी। (४) महीने-भर न रत्नसिह की आँखें खुली, और न चिन्ता की आँखें बन्द हुई । चिन्ता उसके पास से एक क्षण के लिए भी कहीं न जाती। न अपने इलाके की परवा थी, न शत्रुओं के बढ़ते चले आने की फिक्र । रत्नसिह पर वह अपनी सारी विभूतियों को बलिदान कर चुकी थी। पूरा महीना बीत जाने के वाद रत्नसिंह की आँख खुली। टेखा-चारपाई पर पड़ा हुआ है, और चिन्ता सामने पखा लिये खड़ी है। क्षीण स्वर में बोला-चिन्ता, पंखा मुझे दे दो, तुम्हें कष्ट हो रहा है । चिन्ता का हृदय इस समय स्वर्ग के अखण्ड, अपार सुख का अनुभव कर रहा था। एक महीना पहले जिस शीर्ण शरीर के सिरहाने बैठी हुई वह नैराश्य से रोया करती थी, उसे आज बोलते देखकर उसके आह्लाद का पारावार न था। उसने स्नेह-मधुर स्वर में कहा-प्राणनाथ, यदि यह कष्ट है, तो सुख क्या है, मैं नहीं जानती। 'प्राणनाथ'-इन सम्बोधन में विलक्षण मन्त्र की-सी शक्ति थी । रत्नसिंह की आँखें चमक उठीं। जीर्णमुद्रा प्रदीप्त हो गई, नसों में एक नये जीवन का सञ्चार हो उठा, और वह जीवन कितना स्फूर्तिमय था, उसमें कितना उत्साह, कितना माधुर्य, कितना उल्लास और कितनी करुणा थी। रत्नसिंह के अङ्ग-अङ्ग फड़कने लगे। उसे अपनी भुजाओं में अलौकिक पराक्रम का अनुभव होने लगा। ऐसा जान पड़ा, मानो वह सारे ससार को सर कर सकता है, उढ़कर आकाश पर पहुंच सकता है, पर्वतों को चीर सकता है। एक क्षण के लिए उसे ऐसी तृप्ति हुई, मानो उसकी सारी अभिलाषाएँ पूरी हो गई हैं, और वह अब किसी से कुछ नहीं चाहता , शायद शिव