पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/७७

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सती ७१ को सामने खड़े देखकर भी वह मुँह फेर लेगा, कोई वरदान न मांगेगा। उसे अब किसी ऋद्धि की, किसी पदार्थ की इच्छा न थी। उसे गर्व हो रहा था, मानो उससे अधिक सुखो, उससे अधिक भाग्यशालो पुरुष ससार में और कोई न होगा। चिन्ता अभी अपना वाक्य पूरा न कर पाई थी। उसी प्रसङ्ग में बोली-हाँ, आपको मेरे कारण अलबत्ता दुस्सह यातना भोगनी पड़ी। रत्नसिंह ने उठने की चेष्टा करके कहा-बिना तप के सिद्धि नहीं मिलती। चिन्ता ने रत्नसिह को कोमल हाथों से लिटाते हुए कहा-इस सिद्धि के लिए तुमने तपस्या नहीं की थी। झूठ क्यों बोलते हो ? तुम केवल एक अबला की रक्षा कर रहे थे। यदि मेरी जगह कोई दूसरी स्त्री होती, तो भी तुम इतने ही प्राण-पण से उसकी रक्षा करते। मुझे इसका विश्वास है। मैं तुमसे सत्य कहती हूँ, मैंने आजीवन ब्रह्मचारिणी रहने का प्रण कर लिया था लेकिन तुम्हारे आत्मोत्सर्ग ने मेरे प्रण को तोड़ डाला। मेरा पालन योद्धाओं की गोद में हुआ है , मेरा हृदय उसी पुरुषसिंह के चरणों पर अर्पण हो सकता है, जो प्राणों की वाजी खेल सकता हो। रसिको के हास-विलास, गुण्डों के रूप-रग और फेकैतों के दाव-घात का मेरी दृष्टि में रत्ती-भर भी मूल्य नहीं। उनकी नट-विद्या को मैं केवल तमाशे की तरह देखती हूँ। तुम्हारे ही हृदय मे मैंने सच्चा उत्सर्ग पाया, और तुम्हारी दासी हो गई- आज से नहीं, बहुत दिनों से । ' प्रणय की पहली रात थी। चारों ओर सन्नाटा था। केवल दोनों प्रेमियों के हृदयों में अभिलाषाएँ लहरा रही थीं। चारों ओर अनुरागमयी चाँदनी छिटकी हुई थी, और उसकी हास्यमयी छटा मे वर और बधू प्रेमालाप कर रहे थे। सहसा खबर आई कि शत्रुओं की एक सेना किले की ओर बढ़ी चली आती है। चिन्ता चौंक पड़ी , रत्नसिंह खड़ा हो गया, और खूटी से लटकती हुई तलवार उतार ली। चिन्ता ने उसकी ओर कातर-स्नेह की दृष्टि से देखकर कहा-कुछ आदमियों को उधर भेज दो, तुम्हारे जाने को क्या ज़रूरत है ? रत्नसिंह ने बन्दूक कन्धे पर रखते हुए कहा- मुझे भय है कि अबकी वे लोग बड़ी संख्या में आ रहे हैं।