पृष्ठ:मानसरोवर भाग 5.djvu/७९

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सती ७३. 'बांकी तेरी पाग सिपाही, इसकी रखना लाज । तेरा-तबर कुछ काम न आवे, बखतर-ढाल व्यर्थ हो जावे। रखियो मन में लाग, सिपाही बाँकी तेरी पाग । इसकी रखना लाज। पहाड़ियाँ इन वीर-स्वरों से गूंज रही थीं। घोड़ों की टाप ताल दे रही थी। यहाँ तक कि रात बीत गई, सूर्य ने अपनी लाल आँखें खोल दी और इन वोरों पर अपनी स्वर्णच्छटा की वर्षा करने लगा। वहीं रक्तमय प्रकाश में शत्रुओं की सेना एक पहाड़ी पर पड़ाव डाले हुए नज़र आई। रत्नसिंह सिर मुकाये, वियोग-व्यथित हृदय को दबाये, मन्द गति से पीछे-पीछे चला आता था। कदम आगे बढ़ता था; पर मन पीछे हटता था। आज जीवन में पहली बार दुश्चिन्ताओं ने उसे आशङ्कित कर रखा था । कौन जानता है, लड़ाई का अन्त क्या होगा ! जिस स्वर्ग-सुख को छोड़कर वह आया था, उसकी स्मृतियाँ रह-रहकर उसके हृदय को ममोस रही थीं। चिन्ता की सजल आँखें याद आती थीं, और जी चाहता था, घोड़े की रास पीछे मोड़ दें। प्रतिक्षण रणोत्साह क्षीण होता जाता था, सहसा एक सरदार ने समीप आकर कहा-भैया, वह देखो, ऊँची पहाड़ी पर शत्रु, डेरे डाले पड़ा है । तुम्हारी अब क्या राय है ? हमारी तो यह इच्छा है कि तुरन्त उन पर धावा कर दें। गाफिल पड़े हुए हैं. भाग खड़े होंगे। देर करने से वे भी सँभल जायेंगे, और तव मामला नाजुक हो जायगा । एक हजार से कम न होंगे। रत्नसिंह ने चिन्तित नेत्रों से शत्र-दल की और देखकर कहा-हाँ, मालूम तो होता है। सिपाही-तो वावा कर दिया जाय न ? रत्न-जैसी तुम्हारी इच्छा । सख्या अधिक है, यह सोच लो। सिपाही-इसकी परवाह नहीं । हम इससे बड़ी सेनाओ को परास्त कर चुके है। रत्न०-यह सच है ; पर आग में कूदना ठीक नहीं। सिपाही-भैया, तुम कहते क्या हो ? सिपाही का तो जीवन ही आग में कूदने के लिए है । तुम्हारे हुक्म की देर है, फिर हमारा जीवट देखना । रत्न०-अभी हम लोग बहुत थके हुए हैं। ज़रा विश्राम कर लेना अच्छा है।