पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१२०

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पाप का श्रमिकुण्ड १३५ ( ४ ) रात बहुत बीत गयी है । आकाश में अँधेरा छा गया है । सारस की दुःख री बोली कभी-कभी सुनाई दे जाती है और रह रहकर किले के सन्तरियों प्रावाज़ कान में आ पड़ती है। राजनन्दिनी की ऑख एकाएक खुली, तो धर्मसिंह को पलॅग पर न पाया। चिन्ता हुई, वह झट उठकर ब्रजविलासिनी मरे की ओर चली और दरवाजे पर खड़ी होकर भीतर की ओर देखने । सदेह पूरा हो गया। क्या देखती है कि व्रजविलासिनी हाथ मे वेगा खड़ी है और धर्मसिंह दोनों हाथ जोड़े उसके सामने दीनों की तरह घुटने बैठे हैं। वह दृश्य देखते ही राजनन्दिनी का खून सूख गया और उसके में चक्कर आने लगा, पैर लड़खड़ाने लगे । जान पड़ता था कि गिरी जाती वह अपने कमरे में आयी और मुँह ढंककर लेट रही, पर उसकी आँखों से भी न निकली। दूसरे दिन पृथ्वीसिंह बहुत सवेरे ही कुँवर धर्मसिंह के पास गये और राकर बोले-भैया, मौसिम बढ़ा सुहावना है, शिकार खेलने चलते हो ? धर्मसिंह हों, चलो। दोनों राजकुमारों ने घोड़े कसवाये और जगल की ओर चल दिये। सिंह का चेहरा खिला हुआ था, जैसे कमल का फूल । एक एक अंग से और चुत्ती टपकी पड़ती थो; पर कुँवर धर्मसिंह का चेहरा मैला हो गया मानो बदन में जान ही नहीं है । पृथ्वीसिंह ने उन्हें कई बार छेड़ा; पर देखा कि वे बहुत दुखी हैं, तो चुप हो गये। चलते-चलते दोनों आदमी 1 के किनारे पर पहुँचे। एकाएक धर्मसिंह ठिठके और बोले-मैंने आज को एक दृढ़ प्रतिज्ञा की है। यह कहते-कहते उनकी आँखों में पानी श्रा । पृथ्वीसिंह ने घबड़ाकर पूछा-फैसी प्रतिज्ञा ? तुमने ब्रजविलासिनी फा हाल सुना है ? मैंने प्रतिशा की है कि जिस आदमी उसके बाप को मारा है, उसे भी जहन्नुम पहुँचा दें। 'तुमने सचमुच वीर-प्रतिज्ञा की है।' 'हो, यदि मैं पूरी न कर सकें । तुम्हारे विचार में ऐसा आदमी मारने योग्य नदी