पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१४४

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गया । आँखों से आँसू बहने लगे। सुरेश के मुखारविंद पर दया की ज्योति झलक रही थी। विमल ने उनके बारे में जो अनुचित सदेह किया था. उसके लिए वह अपने को धिकार रहा था । शीतला ने ज्यों ही सुना कि सुरेशसिंह पाये हैं, तुरन्त शीशे के सामने गयी । केश छिटका लिये और विपाद की मूर्ति बनी हुई विमल के कमरे में यायी । कहाँ तो विमल की आँखें बन्द थीं, मूञ्छित-सा पड़ा था, कहाँ शीतला के आते ही आँखें खुल गयौं । अनिमय नेत्रों से उसकी ओर देखकर बोला- अभी आयी हैं ? श्राज फे तीसरे दिन आना। कुँवर साहब से उस दिन फिर भेंट हो जायगी। शीतला उलटे पाँव चली गयी। सुरेश पर घड़ों पानी पड़ गया । मन में सोचा, कितना रूप लावण्य है ; पर कितना विषाक्त ! हृदय की जगह केवल शृंगार-लालसा! आतक बढ़ता गया। सुरेश ने डाक्टर बुलवाये ; पर मृत्यु-देव ने किसी की न मानी । उनका हृदव पापाण है। किसी भाँति नहीं पसीजता । कोई अपना हृदय निकालकर रख दे, आँसुओं की नदी बहा दे, पर उन्हें दया नहीं आती । बसे हुए घर को उजाहना, लहराती हुई खेती को सुखाना उनका का. है। और उनकी निर्दयता कितनी विनोदमय है ! वह नित्य नये रूप बदलते रहते हैं। कभी दामिनी बन जाते हैं, तो कभी पुष्प-माला । कभी सिंद बन जाते है, तो कभी सियार । कभी अमि के रूप में दिखाई देते हैं, तो कभी जल के रूप में। तीसरे दिन, पिछली रात को, विमल की मानसिक पीड़ा और हृदय-ताप का अन्त हो गया । चोर दिन को कभी चोरी नहीं करता। यम के दूत प्रायः रात ही को सबकी नजर बचाकर आते हैं और प्राण-रन को चुग ले जाते हैं। प्राकाश के फूल मुरझाये हुए थे | पृक्षसमूह स्थिर घे ; पर शोक में मग्न, सिर मुकाये हुए । रात शोक का वाधरूप है । रात मृत्यु का क्रीडामंत्र है । उसी समय विमल फे घर ते आर्तनाद सुनाई दिया-वह नाद, जिसे सुनने के लिए मृत्यु-देव विकल रहते हैं। शीतला चौक पढ़ी और घबगई दुई मरणशव्या की ओर चली । उसने 7