पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१४५

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मानसरोवर मृतदेह पर निगाह डाली और भयभीत होकर एक पग पीछे हट गयी । उसे जान पड़ा, विमलसिंह उसकी अोर अत्यत तीव्र दृष्टि से देख रहे हैं । बुझे हुए दीपक में उसे भयकर ज्योति दिवाई पड़ी । वह मारे भय के वहाँ ठहर न 'सकी । द्वार से निकल ही रही थी कि सुरेशसिंह से भेंट हो गयी । कातर स्वर में बोली-मुझे वहाँ डर लगता है । उसने चाहा कि रोती हुई इनके पैरों पर गिर पहूँ, पर वह अलग हट गये । त्याग, - जब किसी पथिक को चलते चलते ज्ञात होता है कि मैं रास्ता भूल गया है, तो वह सीधे रास्ते पर आने के लिए बड़े वेग से चलता है । अँझलाता है कि मैं इतना असावधान क्यों हो गया ? सुरेश भी अब शाति-मार्ग पर श्राने के लिए विकल हो गये । मगला की स्नेहमयी सेवाएँ याद आने लगीं। हृदय में वास्तविक सौंदयोपासना का भाव उदय हुआ । उसमें कितना प्रेम, कितना कितनी क्षमा थी! उसकी अतुल पति-भक्ति को याद करके कभी-कभी वह तड़प जाते । आह ! मैंने घोर अत्याचार किया । ऐसे उज्वल रत का दर न किया । मैं यहीं जड़वत् पड़ा रहा और मेरे सामने ही लक्ष्मी घर से निकल गयी ! मगला ने चलते-चलते शीतला से जो बातें कही थी, वे उन्ह मालूम थीं, पर उन बातों पर विश्वास न होता था। मगला शाति प्रकृति को थी। वह इतनी उद्दण्डता नहीं कर सकती । उसमें क्षमा या, वह इतना विद्वेष नहीं कर सकती ; उनका मन कहता था कि वह जीती है और कुशल से है । उसके मैकेवालो को कई पत्र लिखे , पर वहाँ व्यग्य और कटुवाक्यों के सिवा और क्या रखा था ? अन्त को उन्होंने लिखा-अब उस रत्न की खोज में स्वय जाता हूँ। या तो लेकर ही पाऊँगा, या कहीं मुँह में कालिख लगाकर हूब मरूँगा। इस पत्र का उत्तर आया-अच्छी बात है, जाइए, पर यहाँ से होते हुए जाइएगा । यहाँ से भी कई श्रापके साथ चला जायगा । सुरेशसिंह को इन शब्दों में आशा की झलक दिखायी दी। उसी दिन प्रस्थान कर दिया। किसी को साथ नहीं लिया । ससुगल में किसी ने उनका प्रेममय स्वागत नहीं किया । सभी के मुंह फूले हुए थे । ससुरजी ने तो उन्हें पति धर्म पर एक लम्बा उपदेश दिया।