पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१५

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१५ मानसरोवर

लोग अखाड़े पास पहुँचे तो देखा कि अखाड़े में बिजलियाँ-सी चमक रही हैं । बुन्देलों के दिलों पर उस समय जैसी बीत रही थी, उसका अनुमान करना कठिन है। उस समय उस लम्बे चौड़े मैदान में जहाँ तक निगाह जाती थी, आदमी ही आदमी नजर आते थे ; पर चारों तरफ सन्नाटा था। हरएक आँख अखाड़े की तरफ़ लगी हुई थी और हरएक का दिल हरदौल की मगल कामना के लिए ईश्वर का प्रार्थी था । कादिर खाँ का एक एक वार हजारों दिलों के टुकड़े कर देता था और हरदौल की एक-एक काट से मनों में आनन्द की लहरें उठती थीं। अखाड़े में दो पहलवानों का सामना था और अखाड़े के बाहर आशा और निराशा का । आखिर घड़ियाल ने पहला पहर बजाया और हरदौल की तलवार बिजली बनकर कादिर के सिर पर गिरी। यह देखते ही बुन्देले मारे आनन्द के उन्मत्त हो गये। किसी को किसी की सुधि न रही। कोई किसी से गले मिलता, कोई उछलता और कोई छलाँगें मारता था। हजारों आदमियों पर वीरता का नशा छा गया । तलवारें स्वयं म्यान से निकल पड़ी, भाले चमकने लगे । जीत की खुशी में सैकड़ों जानें भेंट हो गयीं। पर जब हरदौल अखाड़े से बाहर आये और उन्होंने बुन्देलों की ओर तेज निगाहों से देखा तो आन की-आन में लोग सँभल गये। तलवारें म्यान में जा छिपी। खयाल आ गया। यह खुशी क्यों यह उमग क्यों, और यह पागलपन किसलिए ? बुन्देलों के लिए यह कोई नयी बात नहीं हुई। इस विचार ने लोगों का दिल ठण्डा कर दिया । हरदौल की इस वीरता ने उसे हरएक बुन्देले के दिल में मानप्रतिष्ठा की ऊँची जगह पर बिठाया, जहाँ न्याय और उदारता भी उसे न पहुँचा सकती थी। वह पहले ही से सर्वप्रिय था और अब वह अपनी जाति का वीरवर और बुन्देला दिलावरी का सिरमौर बन गया ।

             (३)

राजा जुझारसिंह ने भी दक्षिण में अपनी योग्यता का परिचय दिया। वे केवल लड़ाई में ही वीर न थे, बल्कि राज्य शासन में भी अद्वितीय थे | उन्होंने अपने सुप्रबन्ध से दक्षिण प्रान्तों को बलवान् राज्य बना दिया और वर्ष भर के बाद बादशाह से आज्ञा लेकर वे ओरछे की तरफ चले। ओरछे की याद उन्हें सदैव बेचैन करती रही। आह ओरछा! वह दिन कब आयेगा कि फिर