पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१६५

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१५६ मानसरोवर विमता की गोद से उठाना चाहा कि सहसा देवप्रिया ने सरोषस्वर में कहा- खबरदार, इसे मत छूना नहीं तो कान पकडकर उखाड़ लूंगी ! बालक उलटे पॉव लौट पाया और कोठे की छत पर जाकर खूब रोया । कितना सुन्दर बच्चा है ! मैं उसे गोद में लेकर बैठता, तो कैसा मजा आता! मैं उसे गिराता थोड़े ही, फिर उन्होंने क्यों मुझे झिड़क दिया ? भोला बालक क्या जानता था कि इस झिड़की को कारण माता की सावधानी नहीं, कुछ और ही है। एक दिन शिशु सो रहा था। उसका नाम ज्ञानप्रकाश रखा गया था। देवप्रिया स्नानागार में थी । सत्यप्रकाश चुपके से आया और बच्चे का ओढ़ना हटाकर उसे अनुरागमय नेत्रों से देखने लगा। उसका जी कितना चाहा कि गोद में लेकर प्यार करूँ , पर डर के मारे उसने उसे उठाया नहीं, केवल उसके कपोलों को चूमने लगा। इतने में देवप्रिया निकल आई। सत्यप्रकाश को बच्चे को चूमते देखकर भाग हो गयी । दूर ही से डाँटा, हट जा वहाँ से ! सत्यप्रकाश माता को दीननेत्रों से देखता हुआ बाहर निकल आया । सध्या समय उसके पिता ने पूछा-तुम लल्ला को क्यों रुलाया करते हो ? सत्य०-मैं तो उसे कभी नहीं रुलाता । अम्मों खिलाने को नहीं देतीं। देव० -झूठ बोलते हो । आज तुमने बच्चे को चुटकी काटी । -जी नहीं। तो उसकी मुच्छियों ले रहा था । देव--सूस बोलता है। -मैं झूठ नहीं बोलता। देवप्रकाश को क्रोध आ गया । लड़के को दो-तीन तमाचे लगाये । पहिली बार यह ताड़ना मिली, और निरपराध ! इसने उसके जीवन की कायापलट कर दी। सत्य०- सत्य०- उस दिन से सत्यप्रकाश के स्वभाव में एक विचित्र परिवर्तन दिखाई देने लगा । वह घर में बहुत कम आता । पिता पाते, तो उनसे मुंह छिपाता फिरता । कोई खाना खाने को बुलाने आता, तो चोरों की भाँति दबकता हुआ जाकर खा लेता ; न कुछ माँगता, न कुछ बोलता । पहिले अत्यन्त कुशाग्रबुद्धि था ।