पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/१९२

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श्रमावास्या की रात्रि २११ (२) वही अमावास्या की रात्रि थी। किन्तु दीपमालिका अपनी अल्ल जीवनी समाप्त कर चुकी थी। चोरों और जुआरियों के लिए यह शकुन की रात्रि यो, क्योंकि श्राज की हार साल-भर की हार होती है । लक्ष्मी के श्रागमन की धूम थी। कौड़ियों पर अशर्फियाँ लुट रही थीं। भटियों में शराब के बदले पानी विक रहा था। पण्डित देवदत्त के अतिरिक्त कस्वे में कोई ऐसा मनुष्य नहीं था, जो कि दूसरों की कमाई समेटने की धुन में न हो । आज भोर से ही गिरिजा की अवस्था शोचनीय थी । विषम ज्वर उसे एक-एक क्षण में मूर्छित कर रहा था। एकाएक उसने चौंककर आँख खोली और अत्यन्त क्षीण स्वर में कहा- आज तो दीवाली है। देवदत्त ऐसा निराश हो रहा था कि गिरिजा को चैतन्य देखकर भी उसे श्रानन्द नहीं हुआ । बोला-हाँ, अाज दीवाली है। गिरिजा ने आँसू-भरी दृष्टि से इघर-उधर देखकर कहा-हमारे घर में क्यों दीपक न जलेंगे? देवदत्त फूट-फूटकर रोने लगा । गिरिजा ने फिर उसी स्वर में कहा- देखो, आज वरस-बरस के दिन घर अँधेरा रह गया। मुझे उठा दो, मैं भी अपने घर में दीये जलाऊँगी। ये बातें देवदत्त के हृदय में चुभी जाती थीं। मनुष्य की अन्तिम घड़ी लालसायों और भावनाओं में व्यतीत होती है । इस नगर में लाला शकरदास अच्छे प्रसिद्ध वैद्य थे। अपने प्राणसंजीवनी औपघालय में दवाओं के स्थान पर छापने का प्रेस रखे हुए थे। दवाइयों कम वनती यो, किन्तु इश्तहार अधिक प्रकाशित होते थे। वे कहा करते थे कि बीमारी केवल रईसों का ढकोसला है और पोलिटिकल 'एकानोमी ( राजनीतिक अर्थशास्त्र) के मतानुसार इस विलास-पदार्थ से जितना अधिक सम्भव हो, टैक्स लेना चाहिए। यदि कोई निर्धन है तो हो । यदि कोई मरता है तो मरे। उमे क्या अधिकार है कि वह बीमार पड़े और मुफ्त में दवा कराये १ भारतवर्ष की यह दशा अधिकतर मुफ्त दवा कराने से हुई है । इसने मनुष्यों को असावधान और बलहीन बना दिया है। देवदत्त