पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२१८

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आप बीती २४३ ? बैठ गये । और मेरा उनसे कभी का परिचय न था। सोच रहा था, यह कौन आदमी है और यहाँ कैसे आया ? यार लोग उन महाशय की ओर देखकर आपस में इशारेबाज़ियों कर रहे थे। उनके आकार-प्रकार में कुछ नवीनता अवश्य थी। श्यामवर्ण नाटा डील, मुख पर चेचक के दाग, नंगा सिर, बाल मँवारे हुए, सिर्फ सादी कमीज, गले में फूलों की एक माला, पैर में फुल-बूट और हाथ में एक मोटी सी पुस्तक ! मैंने विस्मित होकर नाम पूछा। उत्तर मिला-~-मुझे उमापतिनारायण कहते हैं। मैं उठकर उनके गले से लिपट गया। यह वही कवि महोदय थे, जिनके कई प्रेम पत्र मुझे मिल चुके थे । कुशल समाचार पूछा । पान इलायची से खातिर की । फिर पूछा--आपका आना कैसे हुआ उन्होंने कहा-मकान पर चलिए, तो सव वृत्तात कहूँगा। मैं आपके घर गया था । वहाँ मालूम हुआ, आप यहाँ हैं । पूछता हुआ चला पाया ! मैं उमापतिजी के साथ घर चलने को उठ खड़ा हुआ। जब वह कमरे के बाहर निकल गये, तो मेरे मित्र ने पूछा -यह कौन साहब ये मैं-मेरे एक नये दोस्त हैं। मित्र-ज़रा इनसे होशियार रहिएगा । मुझे तो उचके से मालूम होते हैं मैं-आपका अनुमान ग़लत है । आप हमेशा श्रादमी को उसकी सघ धज ने परखा करते हैं। पर मनुष्य कपड़ों में नहीं, हृदय रहता है। मित्र-खैर, ये रहस्य की बातें तो आप जानें ; मैं आपको आगाह किये देता हूँ। मैंने इसका कुछ जवाब नहीं दिया । उमापति जी के साथ घर पर आया । बाजार से भोजन मंगवाया। फिर बातें होने लगी। उन्होंने मुझे पानी कई - कविताएँ नुनायौं । स्वर बहुत सरस और मधुर या । कविताएँ तो मेरी समझ में खाक न आयो, पर मैंने तारीफों के पुल बाँध दिये । झूम-झूमकर वाह, वाद ! करने लगा ; जैसे मुझमे बढ़कर कोई काप- रसिक ससार में न होगा। सध्या को हम रामलाला देखने गये। लोटकर उन्हें फिर भोजन कराया। अब उन्होंने अपना वृत्तात पुनाना शुरू किया । इस समय