पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२३४

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राज्य-भक २५७ । उन्हें सभी प्रकार के कष्ट दिये जाते थे। यहाँ तक कि भोजन भी यथासमय न मिलता था। उनके परिवार को भी असह्य यातनाएँ दी जाती थी। लेकिन राजा साहब को बदी-गृह में एक प्रकार की शाति का अनुभव होता था। वहाँ प्रति-क्षण यह खटका तो न रहता था कि बादशाह मेरी किसी बात से नाराज न हो जायँ , मुसाहब लोग कहीं मेरी शिकायत तो नहीं कर रहे हैं। शारीरिक कष्टों का सहना उतना कठिन नहीं, जितना कि मानसिक कष्टों का। यहाँ सब तकलीफ़ थीं, पर सिर पर तलवार तो नहीं लटक रही थी। उन्होंने मन में निश्चय किया कि अब चाहे वादशाह मुझे मुक्त भी कर दें, मगर मैं राज-काज से अलग ही रहूँगा । इस राज्य का सूर्य अस्त होनेवाला है , कोई मानवी शक्ति उसे विनाश-दिशा में लीन होने से नहीं रोक सकती। ये उसी पतन के लक्षण हैं। नहीं तो क्या मेरी राज-मक्ति का यही पुरस्कार मिलना चाहिए था ? मैंने अब तक कितनी कठिनाइयों से राज्य की रक्षा की है, यह भगवान् ही जानते हैं एक ओर तो बादशाह की निरंकुशता, दूसरी ओर बलवान् और युक्ति-संपन्न शत्रुओं की कूटनीति-इस शिला और भँवर के बीच में राज्य की नौका को चलाते रहना कितना कष्टसाध्य था ! शायद ही ऐसा काई दिन गुज़रा होगा, जिस दिन मेरा चित्त प्राण-शंका से आदोलित न हुआ हो । इस सेवा, भाक्त और तल्लीनता का यह पुरस्कार है ! मेरे मुख से व्यग्य-शब्द अवश्य निकले, लेकिन उनके लिए इतना कठोर दण्ड १ इससे तो यह कही अच्छा था कि मैं फल कर दिया गया होता, अपनी आँखों से अपने परिवार की यह दुर्गति तो न देखता ! सुनता हूँ, पिताजी को सोने के लिए चटाई नहीं दी गई है ! न जाने त्रियों पर कैसे कैसे अत्याचार हो रहे होंगे। लेकिन इतना जानता हूँ कि प्यारी सुखदा श्रन्त तक अपने सतीत्व की रक्षा करेगी; अन्यथा प्राण त्याग देगी। मुझे इन वेड़ियों की पर्वा नहीं। पर सुनता हूँ, लड़कों के पैरों में भी वेड़िया डाली गयी हैं । यह सब इसी कुटिल रोशनुद्दौला की शरारत है। जिसका जी चाहे, इस समय सता ले, कुचल ले ; मुने किसी से कोई शिकायत नहीं । भगवान् मे यही प्रार्थना है कि अब ससार से उठा ले। मुझे अपने जीवन में जो कुछ करना था, कर चुका, और उसका खूब फ्ल पा चुका । मेरे-जैसे आदमी क लिए संसार में स्थान नहीं है। .