पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२३५

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२५८ मानसरोवर राजा इन्हीं विचारों में डूबे थे । सहसा उन्हें अपनी काल-कोठरी की ओर किसी के आने की आहट मिली। रात बहुत जा चुकी थी। चारों ओर सन्नाटा छाया था, और उस अंधकारमय सन्नाटे में किसी के पैरों की चाप स्पष्ट सुनाई देती थी। कोई बहुत पौत्र दबाकर चला श्रा रहा था। राजा साहब का कलेजा धक धक करने लगा। वह उठकर खड़े हो गये । हम निशस्त्र और प्रतिकार के लिए असमर्थ होने पर भी बैठे बैठे वारों का निशाना नहीं बनना चाहते । खड़े हो जाना आत्मरक्षा का अन्तिम प्रयत्न है। कोठरी में ऐमी कोई वस्तु न थी, जिससे वह अपनी रक्षा कर सकते । समझ गये, अन्तिम समय आ गया । शत्रुओं ने इस तरह मेरे प्राण लेने की ठानी है । अच्छा है, जीवन के साथ इस विपत्ति का भी अन्त हो जायगा । एक क्षण में उनके सम्मुख एक आदमी श्राकर खड़ा हो गया। राजा साहव ने आकर पूछा-कौन है ! उत्तर मिला-मैं हूँ, आपका सेवक | राजा-ओ हो, तुम हो कप्तान ! मैं शका में पड़ा हुआ था कि कहीं शत्रुओं ने मेरा वध करने के लिए कोई दूत न मेजा हो । कप्तान -शत्रुओं ने कुछ और ही ठानी है। आज बादशाह-सलामत को जान बचती नहीं नजर आती। राजा-अरे! यह क्योंकर ? कप्तान-जबसे अापका यहाँ नजरबन्द किया गया है, सारे राज्य में हाहा कार मचा हुआ है। स्वार्थी कर्मचारियों ने लूट मचा रखी है। अंग्रेजों की खुदाई फिर रही है । जो जी में आता है, करते हैं , किसी की मजाल नहीं कि चूं कर सके । इस एक महीने में शहर के सैकड़ों बड़े-बड़े रईस मिट गये । रोशनुद्दौला की बादशाही है। बाजारों का भाव चढ़ता जाता है । बाहर से व्यापारी लोग डर के मारे कोई चीज ही नहीं लाते । दूकानदारों से मनमानी रकमें मह- - सूल के नाम पर वसूल की जा रही हैं। गल्ले का भाव इतना चढ़ गया है कि कितने ही घरों में चूल्हा जलने की नौबत नहीं आती। सिपाहियों को अभी तक तनख्वाह नहीं मिली । वे जाकर दूकानदारों को लूटते हैं। सारे राज्य में बद- अमली हो रही है। मैंने कई बार यह कैफियत बादशाह-सलामत के कानों तक .