पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२५५

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२७८ मानसरोवर श्रा०- द०- श्रा०- श्रा०-मित्र, मेरे मुँह में तो पानी भर श्राया । तुम्हारी बातों ने तो मेरे पैरों में जान डाल दी। शायद पर होता तो उड़कर पहुँच जाता । .-लो, अव आ ही जाते हैं। यह तम्बाकूवाले की दूकान है, इसके बाद चौथा मकान मेरा ही है। -मेरे साथ बैठकर एक ही थाली में खाना। कहीं ऐसा न हो कि अधिक खाने के लिए मुझे भामीजी के सामने लज्जित होना पड़े। -इससे तुम निश्शक रहो। उन्हें मिताहारी श्रादमी से चिढ़ है। वे कहती हैं-"जो खायेगा ही नहीं वह दुनिया मे काम क्या करेगा ?” श्राज शायद तुम्हारी बदौलत मुझे भी काम करनेवालों की पक्ति में स्थान मिल जावे। कम से कम कोशिश तो ऐसी ही करना । -मई, यथाशक्ति चेष्टा करूँगा। शायद तुम्हें ही प्रधानपद मिल जाये । द०-यह लो, आ गये । देखना सीढ़ियों पर अँधेरा है। शायद चिराग़ जलाना भूल गई । श्रा०- --कोई हर्ज नहीं । तिमिरलोक ही मे तो सिकन्दर को अमृत मिला था। द-अन्तर ही इतना ही है कि तिमिरलोक मे पैर फिसले तो पानी में गिरोगे और यहाँ फिसला तो पथरीली सड़क पर । (ज्योतिस्वरूप पाते हैं। ) ज्योति--सेवक भी उपस्थित हो गया। देर तो नहीं हुई ? डवल मार्च करता आया हूँ। द०-नहीं, अभी तो देर न हुई । शायद श्रापकी भोजनाभिलाषा आपको समय से पहले खींच लाई । आ०-आपका परिचय कराइए । मुझे श्रापसे देखा-देखी नहीं है। द०-(अँगरेजी में ) मेरे सुदूर के सम्बन्ध में साले होते हैं । एक वकील के म्हरिर हैं । जबरदस्ती नाता जोड़ रहे हैं। सेवती ने निमत्रण दिया होगा। मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं । ये अँगरेजी नहीं जानते । आ०--इतना तो अच्छा है । अँगरेजी में ही बात करेंगे।