पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/२६२

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दुराशा २८५.. द०--एक रुक्का लिखकर किसी दूकानदार के सामने फेंक देता। से०-यदि मैं ऐसा करती तो शायद तुम आँख मिलाने का मुझ पर कलक लगाते। द०-अँधेरा हो जाने पर सिर से पैर तक चादर अोढ़कर बाहर निकल जाता और दियासलाई ले आता। घण्टे-दा घण्टे मे अवश्य ही कुछ न कुछ तैयार हो जाता । ऐसा उपवास तो न करना पड़ता। to-बाजार जाने से मुझे तुम गली गली घूमनेवाली कहते और गला काटने पर उतारू हो जाते। तुमने मुझे कभी इतनी स्वतंत्रता नहीं दी। यदि कभी लान करने जाती हूँ तो गाढ़ी का पट बन्द रहता है । द -अच्छा, तुम जीती और मैं हारा । सदैव के लिए उपदेश मिल गया कि ऐसे अत्यावश्यक समय पर तुम्हें घर से बाहर निकलने की स्वतत्रता है। सेल-मैं तो इसे आकस्मिक समय नहीं कहती। आकस्मिक समय तो वह है कि दैवात् घर में कोई बीमार हो जाय और उसे डाक्टर के यहाँ ले जाना आवश्यक हो। -निस्सन्देह वह समय आकस्मिक है। इस दशा में तुम्हारे जाने में कोई हस्तक्षेप नहीं। से०-और भी आकस्मिक समय गिनाऊँ ? ६०-नहीं भाई, इसका सला तुम्हारी बुद्धि पर निर्भर है। श्रा०-मित्र, सन्तोप की समा तो अन्त हो गई, अब प्राण-पीढ़ा हो रही है। ईश्वर करे, घर आबाद रदे, विदा होता हूँ। द०-चस, एक मिनट और, उपस्थित हुश्रा । से०- चटनी और पानी लेते जाप्रो और पूरियों बाजार से मॅगवा इसके सिवा इस समय हो ही क्या सकता है ? द०-(मरदाने कमरे में पाकर) पानी लाया हूँ, प्यालियों में चटनी है। आप लोग जब तक भोग लगावें । मैं अभी अाता है । श्रा-धन्य है ईश्वर ! भला तुम बाहर तो निकले ! मैंने तो समझा था कि एकातवास करने लगे। मगर निक्ले भी तो चटनियों कर । वह स्वादिष्ट 2