पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/३८

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त्यागी का प्रेम यह सोचते हुए उसने स्वामी अमेदानन्द की एक पुस्तक उठायी और उसके एक अध्याय का अनुवाद करने लगी। अब उसकी जीविका का एक- मात्र यही श्राधार था। सहसा किसी ने धीरे से द्वार खटखटाया । वह चौंक पड़ी। लाला गोपीनाथ की आवाज़ मालूम हुई । उसने तुरन्त द्वारखोल दिया। गोपीनाथ आकर खड़े हो गये और सोते हुए वालक को प्यार से देखकर बोले-'श्रानन्दी, मैं तुम्हें मुँह दिखाने लायक नहीं हूँ। मैं अपनी भीरता और नैतिक दुर्बलता पर अत्यन्त लबित हूँ। यद्यपि मैं जानता हूँ कि मेरी बदनामी जो कुछ होनी थी, वह हो चुकी। मेरे नाम से चलनेवाली सस्थाओं को जो हानि पहुँचनी थी, पहुँच चुकी । भव असम्भव है कि मैं जनता को अपना मुँह फिर दिखाऊँ और न वह मुझपर विश्वास ही कर सकती है। इतना जानते हुए भी मुझमें इतना साइस नहीं है कि अपने कुकृत्य का भार सिर ले लूँ। मैं पहले सामाजिक शासन की रत्ती भर परवाह न करता ; पर अव पग-पग पर उसके भय से मेरे प्राण काँपने लगते हैं । धिक्कार है मुझ पर कि तुम्हारे ऊपर ऐसी विपत्तियों पढ़ीं, लोकनिन्दा, रोग, शोक, निर्धनता समी का सामना करना पड़ा और मै यों अलग अलग रहा मानों मुझसे कोई प्रयोजन नहीं है ; पर मेरा हृदय ही जानता है कि उसकी कितनी पीड़ा होती थी। कितनी ही बार इधर आने का निश्चय किया और फिर हिम्मत हार गया। अब मुझे विदित हो गया कि मेरी सारी दार्शनिकता फेवल हाथी का दाँत थी। मुझमें क्रिया-शक्ति नहीं है लेकिन इसके साथ ही तुमसे अलग रहना मेरे लिये असह्य है। तुमसे दूर रहकर मैं ज़िन्दा नहीं रह सकता। प्यारे बच्चे को देखने के लिए मैं कितनी ही पार लालायित हो गया हूँ ; पर यह आशा कैसे करूँ कि मेरी चरित्रहीनता का ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण पाने के बाद तुम्हें मुझसे घृणा न हो गयी होगी। प्रानन्दी-स्वामी, आपके मन में ऐसी बातों का आना मुझ पर घोर अन्याय है । मैं ऐसी बुद्धि हीन नहीं हूँ कि केवल अपने स्वार्थ के लिये आपको कलंकित करूँ। मैं श्रापको अपना इष्टदेव समझती हूँ और सदैव समदूंगी। मैं मी अव आपके वियोग-दुःख को नहीं सह सकती। कभी कभी आपके दर्शन पानी रहूँ, यही जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है। इस घटना को पन्द्रह वर्ष बीत गये हैं। लाला गोपीनाय नित्य बारह बजे