पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/४०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


रानी सारन्धा

T आयी मगर जब अनिरुद्ध छलौंग मारकर बाहर कूद पड़ा तो वह विरहिणी एफ चहान पर बैठकर रोने लगी। इतने में सारन्धा मी वहाँ आ पहुँची। शीतला ने नागिन की तरह बल खाकर कहा-मर्यादा इतनी प्यारी है ? सारन्धा-हाँ। शीतला-अपना पति होता तो हृदय में छिपा लेती। सारन्धा-ना, छाती में छुरा चुभा देती। शीतला ने ऐंठकर कहा-चोली में छिपाती फिरोगी, मेरी वात गिरह में बाँध लो। सारन्धा--जिस दिन ऐसा होगा, मैं भी अपना वचन पूरा कर दिखाऊँगी। इस घटना के तीन महीने पीछे अनिरुद्ध महरौनी को जीत करके लोटा और साल-भर पीछे सारन्धा का विवाह ओरछा के राजा चम्पतराय से हो गया; मगर उस दिन की बातें दोनों महिलाओं के हृदय-स्थल में काँटे की तरह खटकती रहीं। राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुप थे। सारी बुंदेला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहु-बल से राज्य-विस्तार करने लगे। मुसलमानों की सेनाएँ बार बार उन पर हमले करती थी, पर हारकर लौट जाती थीं। यही समय था जब अनिरुद्ध ने सारन्धा का चम्मतराय से विवाह कर दिया। सारन्धा ने मुँह-माँगी मुराद पाई। उसकी यह अभिलापा कि मेरा पति बुंदेला जाति का कुल-तिलक हो, पूरी हुई । यद्यपि राजा के रनिवास में पाँच रानियों थी, मगर उन्हें शीघ्र ही मालूम हो गया कि वह देवी, जो हृदय में मेरी पूजा करती है, सारन्धा है। परन्तु कुछ ऐसी घटनायें हुई कि चपतराय को मुग़ल बादशाह का आश्रित होना पड़ा। वे अपना राज्य अपने भाई पहाइसिंह को सौंपकर देहली चले गये। यह शाहजहाँ के शासनकाल का अन्तिम माग था। शाहजादा