पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/४९

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मानसरोवर अनुभव और निरीक्षण का एक अमूल्य रत्न होगा । मैंने ऐसी ऐसी आश्चर्यजनक घटनाएँ आँखों से देखी हैं, जो अलिफलैला की कथानों से कम मनोरजक न होंगी। परन्तु वह घटना जो मैंने ज्ञानसरोवर के तट पर देखी, उसका उदाहरण मुश्किल से मिलेगा, मैं उसे कमी न भूलूँगा । यदि मेरे इस तमाम परिश्रम का उपहार यही एक रहस्य होता तो भी मैं उसे पर्याप्त समझता। मैं यह बता देना आवश्यक समझता हूँ कि मैं मिथ्यावादी नहीं । और न सिद्धियों तथा विभूतियों पर मेरा विश्वास है । मैं उस विद्वान् का भक्त हूँ जिसका आधार तर्क और न्याय पर है | यदि कोई दूसरा प्राणी यही घटना मुझसे बयान करता तो मुझे उस पर विश्वास करने में बहुत संकोच होता, किन्तु मैं जो कुछ वयान कर रहा हूँ, वह सत्य घटना है । यदि मेरे इस आश्वासन पर भी कोई उस पर अविश्वास करे, तो उसकी मानसिक दुर्बलता और विचारों की सकीर्णता है । यात्रा का सातवाँ वर्ष था, ज्येष्ठ का महीना । मैं हिमालय के दामन में ज्ञानसरोवर के तट पर हरी-हरी घास पर लेटा हुअा था, ऋतु अत्यन्त सुहावनी थी। ज्ञानसरोवर के स्वच्छ निर्मल जल में आकाश और पर्वत-श्रेणी का प्रतिबिम्ब, जलपक्षियों का पानी पर तैरना, शुभ्र हिमश्रेणी का सूर्य के प्रकाश से चमकना आदि दृश्य ऐसे मनोहर थे कि मैं श्रात्मोल्लास से विहल हो गया । मैंने स्विटजरलैंड और अमेरिका के बहुप्रशसित दृश्य देखे हैं, पर उनमें यह शातिप्रद शोभा कहाँ ! मानव-बुद्धि ने उनके प्राकृतिक सौंदर्य को अपनी कृत्रि- मता से कल कित कर दिया है। मैं तल्लीन होकर इस स्वर्गीय श्रानन्द का उप- भोग कर रहा था कि सहसा मेरी दृष्टि एक सिंह पर जा पड़ी, जो मन्दगति से कदम बढ़ाता हुआ मेरी आर पा रहा था । उसे देखते ही मेरा खून सूख गया, होश उड़ गये । ऐसा वृहदाकार भयकर जतु मेरी नजर से न गुजरा था। वहाँ ज्ञानसरोवर के अतिरिक्त कोई ऐसा स्थान नहीं था, जहाँ भागकर अपनी जान बचाता । मैं तैरने में कुशल हूँ, पर मैं ऐसा भय-भीत हो गया कि अपने । स्थान से हिल न सका । मेरे अंग-प्रत्यग मेरे कावू से बाहर थे। समझ गया कि मेरी ज़िन्दगी यहीं तक थी। इस शेर के पजे से बचने की कोई आशा न थी। अकस्मात् मुझे स्मरण हुआ कि मेरी जेब में एक पिस्तौल गोलियों से भरी हुई रखी है, जो मैंने आत्मरक्षा के लिए चलते समय साथ ले ली थी, और अब तक