पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/६३

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८० मानसरोवर “वेटी, तूने मेरे साथ जो उपकार किया है उसका फल तुझे भगवान् देंगे। तूने मेरे राजवश का उद्धार कर दिया, नहीं तो कोई पितरों को जल देनेवाला भी न रहता । मैं तुझे कुछ विदाई देना चाहती हूँ, वह तुझे स्वीकार करनी पड़ेगी। अगर रणधीर मेरा पुत्र है, तो तू मेरी पुत्रा है। तूने ही रणधीर को प्राणदान दिया है, तूने ही इस राज्य का पुनरुद्धार किया है। इसलिए इस माया-बन्धन से तेरा गला नहीं छूटेगा। मै अर्जुननगर का प्रात उपहार स्वरूप तेरी भेंट करती हूँ।" रानी की यह असीम उदारता देखकर मैं दङ्ग रह गयी । कलियुग में भी कोई ऐसा दानी हो सकता है, इसकी मुझे आशा न थी। यद्यपि मुझे धन-भोग की लालसा न थी, पर केवल इस विचार से कि कदाचित् यह सम्पत्ति मुझे अपने भाइयों की सेवा करने की सामर्थ्य दे, मैंने एक जागीरदार की जिम्मेदारियों अपने सिर ली। तब से दो वर्ष व्यतीत हो चुके हैं, पर भोग-विलास ने मेरे मन को एक क्षण के लिए भी चचल नहीं किया । मैं कभी पलंग पर नहीं सोई । रूखी-सूखी वस्तुओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं खाया । पति-वियोग की दशा में स्त्री तपस्विनी हो जाती हैं, उसकी वासनाओं का अन्त हो जाता है। मेरे पास कई विशाल भवन हैं, कई रमणीक वाटिकाएँ हैं, विषय-वासना की ऐसी कोई सामग्री नहीं है जो प्रचुर मात्रा में उपस्थित न हो, पर मेरे लिए वह सब त्याज्य हैं, भवन सूने पडे हैं और वाटिकाओं मे खोजने से भी हरियाली न मिलेगी। मैंने उनकी ओर कभी आँख उठाकर भी नहीं देखा । अपने प्राणाधार के चरणों से लगे हुए मुझे अन्य किसी वस्तु की इच्छा नहीं है। मैं नित्य-प्रति अर्जुननगर जाती हूँ और रियासत के आवश्यक काम-काज करके लौट आती है। नौकर-चाकरों को कड़ी आज्ञा दे दी गयी है कि मेरी शाति में बाधक न हो । रियासत की सम्पूर्ण प्राय परोपकार में व्यय होती है। मैं उसकी कौड़ी भी अपने खर्च में नहीं लाती। आपको अवकाश हो तो आप मेरी रियासत का प्रबन्ध देखकर बहुत प्रसन्न होगे। मैंने इन दो वर्षों में बीस बड़े-बड़े तालाब वनवा दिये हैं और चालीस गोशालाएँ बनवा दी हैं। मेरा विचार है कि अपनी रिया त में नहरों का ऐसा जाल बिछा दूँ जैसे शरीर में नाड़ियों का । मेने एक सौ कुशल वैद्य नियुक्त कर दिये हैं जो ग्रामों में विचरण करें और रोग