पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/६५

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मानसरोवर - ताजमहल के अतिरिक्त और कहीं नहीं देखी। फर्श की पच्चीकारी को देखकर उस पर पाँव धरते सकोच होता था । दीवारों पर निपुण चित्रकारों की रचनाएँ शोभायमान थीं। बारहदरी के दूसरे सिरे पर एक चबूतरा था जिस पर मोटी कालीनें बिछी हुई थीं। मैं फर्श पर बैठ गया। इतने में एक लम्बे कद का रूपवान् पुरुष अन्दर आता हुआ दिखायी दिया। उसके मुख पर प्रतिमा की ज्योति झलक रही थी और आँखों से गर्व टपका पड़ता था। उसकी काली और भाले की नोक से सदृश तनी हुई मूंछे, उसके भौरे की तरह काले धूपरराले बाल उसकी आकृति की कठोरता को नम्र कर देते थे। विनयपूर्ण वीरता का इससे सुन्दर चित्र नहीं खिंच सकता था। उसने मेरी ओर देखकर मुसकराते हुए कहा--"आप मुझे पहचानते हैं ?” मैं अदव से खड़ा होकर बोला-"मुझे आपसे परिचय का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ ।” वह कालीन पर बैठ गया और बोला, "मैं शेरसिंह हूँ ।” मैं अवाक रह गया। शेरसिंह ने फिर कहा, "क्या आप प्रसन्न नहीं हैं कि आपने मुझे पिस्तौल का लक्ष्य नहीं बनाया ? मैं तब पशु या अब मनुष्य हूँ।” मैंने कहा, "आपको हृदय से धन्यवाद देता हूँ। यदि आशा हो, तो मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहता हूँ।" शेरसिंह ने मुसकराकर कहा-मैं समझ गया, पछिए । मैं-जब आप समझ ही गये तो मैं पूछू क्यों ? शेर-सम्भव है, मेरा अनुमान ठीक न हो । मैं-मुझे मय है कि उस प्रश्न से आपको दुःख न हो । शेर-कम से-कम आपको मुझसे ऐसी शंका न करनी चाहिए। मैं-विद्याधरी के भ्रम में कुछ सार था ? शेर सिंह ने सिर झुकाकर कुछ देर में उत्तर दिया-जी हाँ, था। जिस वक्त, मैंने उसकी कलाई पकड़ी थी उस समय श्रावेश से मेरा एक-कए अग काँप रहा था। मैं विद्याधरी के उस अनुग्रह को मरणपर्यन्त न भूलूंगा। मगरह तना, प्रायश्चित्त करने पर भी मुझे अपनी ग्लानि से निवृत्ति नहीं हुई । ससार की काई वस्तु स्थिर नहीं, किन्तु पाप की कालिमा अमर और अमिट है। यश और कीर्ति कालान्तर में मिट जाती है किन्तु पाप का धब्बा नहीं मिटता । मेरा विचार है कि ईश्वर भी दाग को नहीं मिटा सकता | कोई तपस्या, कोई दण्ड, कोई