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मानसरोवर

गुमानी आपत्ति के भाव से बोली --- तुम बताते क्यों नहीं, हाँ जा रहे हो ?

'तू मेरे साथ चलेगी या नहीं ?'

'जब तक तुम बता न दोगे, मैं न जाऊँगी।'

मालूम हो गया, तू नहीं जाना चाहतो। मुझे इतना हो पूछना था, नहीं अब तक में आधी दूर निकल दाया होता।'

यह कहकर वह उठा और अपने घर को ओर चला। गुमानी पुकारती रही --- 'सुन लो, सुन लो'; पर उसने पीछे फिरकर भी न देखा।

( ६ )

तीस मील की मंजिल हरिधन ने पांच घण्टों में तय की। जब वह अपने गाँव की अमराइयों के सामने पहुंचा, तो उसको मातृ-भावना ऊषा की सुनहरी गोद में खेल रही थी। उन वृक्षों को देखकर उसका विह्वल हृदय नाचने लगा। मन्दिर का यह सुनहरा श देखकर वह इस तरह दौड़ा मानों एक छलांग में उसके ऊपर आ पहुँचेगा। वह वेग से दौड़ा जा रहा था मानों उसको माता गोद फैलाये उसे बुला रहो हो। जप वह धामों के बाग में पहुंचा, जहाँ डालियों पर पैठर वह हाथी की सवारीका बालन्द पाता था, जहाँ कच्ची नेरों और लिसोड़ों में एक स्वर्गीय स्वाद था, तो वह बैठ गया और भूमि पर सिर झुकाकर रोने लगा, मानों अपनी माता को अपनी विपत्ति कथा सुना रहा हो। वहाँ लो वायु में, वहाँ के प्रकाश में, मानों उसकी विराट-रूपिणी माता व्याप्त हो रही थी, वहाँ की अगुल- भगुल भूमि माता के पद-चिहों से पवित्र थी, माता के स्नेह में डूबे हुए शब्द अभी तक मानो आकाश में गूंज रहे थे। इस वायु और इस आकाश में न जाने कौन-सी संजीवनी थी जिसने उसके शोकात हृदय को फिर वालोत्साह से भर दिया। वह एक पेड़ पर चढ़ गया और अधर से आम तोड़-तोड़कर खाने लगा। सास के वह कठोर शब्द, स्त्री का वह निष्ठुर आघात, वह सारा अपमान उसे भूल गया। उसके पाव फूल गये थे, तलवों में जलन हो रही थी। पर इस आनन्द में उसे किसी बात का ध्यान न था।

सहसा रखवाले ने पुकारा --- वह कौन ऊपर चढ़ा हुआ है रे ? उतर अभी, नहीं तो ऐसा पत्थर खींचकर मारूंगा कि वहीं ठंडे हो जाओगे।

उसने कई गालियां भी दी। इस फाटकर और इन गालियों में इस समय हरिधन