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घरजमाई


को अलौकिक आनन्द मिल रहा था। वह डालियों में छिप गया, कई आम काट- काटकर नीचे गिराये, और जोर से ठछा मारकर हँसा। ऐसी उल्लास से भरी हुई हँसी उसने बहुत दिन से न हँसी थी।

रखवाले को यह हँसी परिचित मालूम हुई , मगर हरिधन यहाँ कहाँ ? वह तो ससुराल की रोटियाँ तोड़ रहा है। केसा हंसोड़ था, कितना चिविल्ला। न जाने बेचारे का क्या हाल हुआ। पेड़ की डाल से तालाब में कूद पड़ता था। अब गाँव में ऐसा

डाँटकर बोला --- वहाँ से वैठे भेटे हँसोगे, तो आकर सारी हँसो निशाल दूंगा, नहीं सीधे से उतर आओ।

वह गालियां देने जा रहा था कि एक गुठली आकर उसके सिर पर लगी। सिर सहलाता हुआ बोला --- यह कौन सैतान है, नहीं मानता, ठहर तो, मैं आभर तेरो खबर लेता हूँ।

उसने अपनी लकड़ी नीचे रख दो और बन्दरों की तरह चट-पट कार चढ़ गया। देखा तो हरिधन बैठा मुखकिरा रहा है। चकित होकर बोला --- अरे हरिधन। तुम यहाँ कब आये। इस पेड़ पर कबसे पेठे हो ?

दोनों बचपन के सखा वहीं गले मिले।

'यहाँ कर आये ? चलो, घर चलो। भले आदमी, क्या वहाँ आप्न भो मयस्सर न होते थे ?

हरिधन ने मुस्किराकर कहा --- मॅगरू, इन आर्मों में जो स्वाद है, वह और कहीं के आर्मों में नहीं है। गाँव का क्या रजा ढग है ?

मँगरू --- सब चैनवान है भैया ! तुमने तो जैसे नाता हो तोड़ लिया। इस तरह कोई अपना गांध-घर छोड़ देता है। जबसे तुम्हारे दादा मरे, सारी गिरस्ती चौपट हो गई। दो छोटे-छोटे लड़के हैं। उनके लिये क्या होता है।

हरिधन --- अब उस गिरस्ती से क्या वास्ता है भाई ? मैं तो अपना ले-दे चुका । मजूरी तो मिलेगी न ? तुम्हारी भैया मैं ही चरा दिया करूँगा, मुझे खाने को दे देना।

मँगरू ने अविश्वास के भाव से कहा --- अरे भैया, कैसी.बाते करते हो, तुम्हारे लिए जान हाजिर है। क्या ससुराल में अब न रहोगे ? कोई चिन्ता नहीं। पहले तो तुम्हारा घर ही है। उसे सँभालो ! छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनको पालो ! तुम नई अम्माँ