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मानसरोवर

'निकालो पेट से। तुमने क्यों खाया मेरा अमरूद ?'

'अमरूद तुमने दिया, तब मैंने खाया। मैं तुमसे मांगने न गया था।'

'जब तक मेरा अमरूद न दोगे, मैं दाँव न दूंगा।'

मैं समझता था, न्याय मेरी ओर है। आखिर मैंने किसी स्वार्थ से ही उसे अमरूद खिलाया होगा। कौन निःस्वार्थ किसी के साथ सलूक करता है। भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए हो देते हैं। जन गया ने अमरूद खाया, तो फिर उसे मुमसे दांव लेने का क्या अधिकार है। रिश्वत देकर तो लोग खून पचा जाते हैं। यह मेरा अमरूद यों हो हजम कर जायगा ? अमरुद पैसे के पांचवाळे थे, जो गया के माप को भी नसीब न होंगे। यह सरासर अन्याय था।

गया ने मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा-मेरा दाँव देकर जाओ, अमरूद- समरूद में नहीं जानता।

मुझे न्याय का बल था। वह अन्याय पर डटा हुआ था। मैं हाथ छुड़ाकर भागना चाहता था। वह मुझे जाने न देता था। मैंने गाली दी, उसने उससे कड़ी गाली दी, और गाली ही नहीं, दो-एक चांटा जमा दिया। मैंने उसे दात काट लिया। उसने मेरी पीठ पर हण्डा जमा दिया। मैं रोने लगा। गया मेरे इस अस्त्र का मुका- बला न कर सका। भागा। मैंने तुरन्त बासू पोंछ डाले, डण्डे को चोट भूल गया और हसता हुआ घर जा पहुंचा। मैं थानेदार का लड़का, एक नोच जात के लौंडे के हाथों पिट गया, यह मुझे उस समय भी अपमानजनक मालूम हुआ; लेकिन घर में किसी से शिकायत न को।

( २ )

उन्हीं दिनों पिताजी का वही से तबादला हो गया। नई दुनिया देखने को खुशो में ऐसा फूला कि अपने हमजोलियों से बिछुड़ जाने का बिलकुल दुःख न हुआ। पिताजी दुखी थे। यह बड़ी आमदनी की जगह थी। अम्माजो भी दुखी थीं, यहाँ सब चीजें सस्ती थी, और मुहल्ले की स्त्रियों से धराव-सा हो गया था, लेकिन मैं मारे खुशी के फूला न समाता था। लड़कों से जीट उड़ा रहा था, वहां ऐसे घर थोड़े ही होते हैं। ऐसे-ऐसे ऊँचे. घर है कि आसमान से बातें करते हैं। वहां के अंग्रेजी स्कूल में कोई मास्टर लड़कों को पोटे, तो उसे जेहल हो जाय। मेरे मित्रों की फैली हुई पाखें और चकित-मुद्रा बतला रही थी कि मैं उनकी निगाह में कितना