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मेरी आत्मकहानी
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को देते जाते थे जो उसकी साफ नकल करता जाता था। इस प्रकार यह भाषण दो-तीन दिन में तैयार हुआ और सम्मेलन में जाकर दिया गया। एक महाशय ने इस भाषण पर यह कहा कि यह भाषण पहले से लिखा रहा था, कहीं इतने थोडे ममय मे ऐसा भाषण लिखा जा सकता है। उन्हें क्या ज्ञात था कि यह किस परिस्थिति में लिखा गया। यहाँ से सम्मेलन पटने गया और पटने सें जबलपुर। जबलपुर-सम्मेलन के सभापति मेरे संस्कृत के शिक्षक पंडित गमावतार शर्मा पांडेय थे। वे सम्मेलन समाप्त होने के पहले ही चल गए। बीच-बीच में भी व सध्योपासन आदि के लिये सम्मेलन से उठ जात थे। इन अवस्थाओं में मुझे उनका प्रतिनिधित्व करना पड़ता था। सम्मेलन में मेरे दो भापण बडे प्रभावशाली हुए। पहला तो सम्मेलन के लिये धन बटोरने की अपील करते हुए हुआ। मुझे खेद है कि बाबू रामचद्र वर्म्मा ने इसे नही लिखा यद्यपि वे वहाँ उपस्थित थे। सम्मेलन का बड़ा पडाल प्रतिनिधियों और दर्शको से खचाखच भरा था। कही खडे होने तक की जगह न थी। बड़ा हल्ला मच रहा था। मेरे भाषण आरभ करने के साथ ही वहाँ पूर्ण शांति छा गई। हम लोगो का डेरा पास ही था। उस समय बाबू रामचद्र वर्म्मा आदि डेरे पर चले गए थे। मेरे भाषण देते ही वे लौट आए। पीछे से बाबू रामचंद्र वर्म्मा ने कहा कि हम लोगों ने डेरे पर आपकी आवाज पहचानी और यह जाना कि आप बोल रहे है। बस हम लोग पडाल में चले आय। जबलपुर-सम्मेलन की रिपोर्ट में इस भाषण का संक्षेप अग्रलिखित प्रकार दिया है-