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पृष्ठ:रस मीमांसा.pdf/३७२

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अप्रस्तुत रूप-विधान . ३५९ मात्र हैं। यह ठीक है कि वाक्य की कुछ विलक्षणता—जैसे श्लेष और यमक–द्वारा श्रोता या पाठक का ध्यान आकर्षित करने के लिये भी अलंकार की थोडीं बहत योजना होती है, पर उसे वहत ही गौण समझना चाहिए । काव्य की प्रक्रिया के भीतर ऊपर कहीं बातों में से किसी एक में भी जिससे कई एक में एक साथ सहायता पहुँचती है, उसे उत्तम कहेंगे। अलंकार के स्वरूप की ओर ध्यान देते ही इस बात का पता चल जाता है कि वह कथन की एक युक्ति या वर्णनशेली मात्र है। यह शैली सर्वत्र काव्यालंकार नहीं कहला सकती । उपमा को ही लीजिए जिसका आधार होता है सादृश्य । यदि कहीं सादृश्ययोजना का उद्देश्य बोध कराना मात्र है तो वह काव्यालंकार नहीं। नीलगाय गाय के सदृश होती है। इसे कोई अलंकार नहीं कहेगा। इसी प्रकार ‘एकरूप तुम भ्राता दी। तेहि भ्रम ते नहिं मारेउँ सोऊ ।' में भ्रम अलंकार नहीं है। केवल ‘बस्तुत्व' या ‘प्रमयत्व' जिसमें हो, वह अलंकार नहीं ।* अलंकार में रमणीयता होनी चाहिए। चमत्कार न कहकर रमणीयता हम इसलिये कहते हैं कि चमत्कार के अंतर्गत केवल भाव, रूप, गुण या क्रिया का उत्कर्ष ही नहीं, शुब्द-कौतुक और अलंकार-सामग्री की विलक्षणता भी ली जाती है। जैसे, वादल के स्तूपाकार टुकड़े के ऊपर निकले हुए चंद्रमा को देख यदि कोई कहे कि ‘मानो ऊँट की पीठ पर घंटा रखा हुआ है तो कुछ लोग अलंकार-सामग्री की इस विलक्षणता पर कवि की इस दूर की सूझ पर ही वाह वाह करने लगेंगे। पर इस उत्प्रेक्षा से ऊपर लिखे प्रयोजनों में से एक भी सिद्ध नहीं होता। बादल के ऊपर निकलते हुए चंद्रमा को देख * साधर्म्य कविसमयप्रसिद्ध कांतिमत्वादि न तु वस्तुत्वप्रमेयत्यादि ग्राह्यम् । -विद्याधर ।