सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:रहीम-कवितावली.djvu/९५

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ प्रमाणित है।
४४
रहीम-कवितावली।

 

५—उत्कण्ठिता।

मुग्धा-उत्कण्ठिता—

गौ जुग[] जाम[] जमिनिआ[], पिय नहिं आइ।

राखेहु कौन सवतिआ, धौं बिलमाइ॥६०॥

मध्या-उत्कण्ठिता—

जोहत[] परी पलँगिआ, पिय कै बाट।

बेचेउ चतुर तिरिअवा, धौं केहि हाट॥६१॥

प्रौढ़ा-उत्कण्ठिता—

पिय-पथ हेरति गोरिआ, भो भिनुसार[]

चलहु न करिहि तिरिअवा, तुव इतबार॥६२॥

परकीया-उत्कण्ठिता—

उठि-उठि जात खिरकिआ, जोहन बाट।

कत वह आइहि मितवा, सूनी खाट॥६३॥

गणिका-उत्कण्ठिता—

कढ़ि न नींद भिनुसरवा, आलस पाइ।

धन दै मूरुख मितवा, रहल लोभाइ॥६४॥

६—बासकसज्जा।


मुग्धा-बासकसज्जा—

हरुए[] गवन नबेलिआ, डीठि बचाइ।

पौढ़ी जाइ पलँगिआ, सेज बिछाइ॥६५॥

  1. दो,
  2. घड़ी,
  3. रात्रि।
  4. देखती है।
  5. तड़का-सबेरा।
  6. हलके-हलके—चुपके-चुपके।